Saturday, October 10, 2020

मन

प्रथम स्थान 

महाराष्ट्र कलम की सुगंध

जय-जय श्री राम राम जी

8/10/2020/गुरुवार

*मन*

काव्य


मनमोहन मनमंदिर में बसते।

मन की मानें दुनिया रहते।

मन तो मन की ही करता,

मनसे हम लड़ते ही रहते।


मन कुलांच हिरणी सी भरता।

कहीं उ छलकर गिरता पड़ता।

अभी यहां फिर कहीं देख लें,

मन सदैव मनमानी करता।


मन की डोर खींचकर रखना।

मन को सब वश में ही रखना।

जीत हार सब मन से होती,

मन से कम गठबंधन रखना।


मन की किताब कब पढ़ पाते।

मुश्किल से मन से भिड़ पाते।

पल पल में विचार बदले तो,

सब इसके साथ न चल पाते।


स्वरचित

इंजी शंम्भू सिंह रघुवंशी अजेय

गुना म प्र

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द्वितीय स्थान

नमन मंच 

८/१०/२०२०

विषय_ कर्तव्य/ जिम्मेदारी 

विधा_ कविता

(" क्यूं रुके हैं तेरे शिथिल चरण")


रुक गए जो तेरे शिथिल चरण 

 मृत्यु का होगा आमंत्रण,


दुःख से विरक्त है कोई जग में

गर्वित है कौन हुआ नभ में,

कर्तव्य राह में होगा रण

मन की करुणा का निमंत्रण!!

रुक गए जो तेरे शिथिल चरण!!


है व्यथा विकार इस जीवन में

सुख मिलता हरि के सुमिरन में,

अस्तित्व मिटा प्रतिपल प्रतिक्षण

 गिरते हैं अश्रु से अब मधुकण!!

रुक गए जो तेरे शिथिल चरण!!


जैसे प्राण पवन में रहता

जैसे सौंदर्य सुमन में रहता,

नभ में चलते हैं तारागण !!

क्यूं रुके है तेरे शिथिल चरण!!


 जीवन की इस लाचारी से 

उर में उठती चिंगारी से,

लिखा कविता प्रथम चरण

अब रुके न मेरे शिथिल चरण!!

स्वरचित_मौलिक

--------------- अभिषेक मिश्रा 

(केशव पण्डित)

बहराइच, उत्तर प्रदेश

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तृतीय स्थान

नमन 

महाराष्ट क़लम की सुगंध 

विषय ....मन 

08-10-20-गुरुवार 


ये मन है बड़ा चलायमान , 

  ये पावन वेग सा उड़ता है। 

     कभी अंतर्मन का निहोर करे , 

       कभी बाहरी दृश्य टटोलता है । 

              कवि का मन तो वहां पहुँचे, 

            जहां रवि भी नहीं पहुंचता है । 

            ये मन का भीषण द्वंद बना,  

          मन क्यों ना नियन्त्रित रहता है।  

ईश्वर चरणों में जब बैठो , 

  तव मन ये निंद्रा लाता है ।  

   बाहरी जगत की बातों में , 

     हमें बार बार उलझाता है । 

             तुम कुछ भी करना चाहो तो , 

           मन की गति अविरल बहती है। 

         थामो इसको ये ना ही थमे , 

        मुट्ठी से रेत फिसलती है । 

मानव यदि कभी पृथक विचरे , 

 तो आत्मबोध होता रहता । 

   पर मन तो चंचल गती का है , 

      वो पुनः पुनः वहां ही पहुँचा । 

              मन पर अपने अंकुश रखो , 

                ये बार बार उकसाता है।  

                अपने वश जो बात नहीं , 

                  वो बात तुम्हें सुलझाता है।  

सद्भाव से सज्जित रहे ये मन , 

  ये अपनेपन से सधा रहे । 

    मन की गति भी अवरोध न हो, 

      मानव सपनों में सदा रहे । 

             सपने जब मानव देखेगा, 

      . तव ही साकार का चिन्तन हो। 

         मन को समझा कर वो रखता,  

       तो जीवन में सब समुचित हो।


स्वरचित ......सुधा चतुर्वेदी मधुर 

                       . मुंबई

🏵️ तृतीय स्थान🏵️

नमन मंच

दिनांक-8/10/20

विषय-मन


मन चाहा किसको कब मिलता।

ये तो बस अपना नसीब है।

दिल जो चाहे वो मिल जाये।

विरला कोई खुश नसीब है।


यू तो बेगाने बन जाते।

अपनो से भी अपने ज्यादा।

मन का मिलना है बस काफी।

अपना पन होता है सादा।


मीत बने बन कर निभ जाए।

वरना रह जाता गरीब है।

जब मिलते मुस्कान लुटाते।

सुख दुख के साथी बन जाते।


चली अचानक ऐसी आंधी।

व्योहारो ने सीमा बांधी।

संबंधों में धूल चढ़ गई।

हर सपना लगता सलीब है।


जब अपने ही मां दिखाए।

छोड़ झटक दामन छुड़ाए।

बरबस आँखे लगे चुराने।

गहरी पीड़ा लगे अजाने।


पलको पर ढल जाए आंसू।

दर्द बना अपना नसीब है।

झांक रही आंखों से प्रीती।

ये कैसी संकोची रीती।


बाहर भीतर जगा उजाला।

पर कैसा व्यापार निराला।

बहुत कठिन है यहाँ परखना।

भला कौन किसका रकीब है।


ऐसा कहाँ चंद्र मय अम्बर।

जो सुधियों को मधुर हास दे।

मस्तक रेखा साथ निभा दे।

फिर क्या दूरी क्या रकीब है।


मीना तिवारी

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सराहनीय प्रस्तुति

1️⃣

नमनमंच संचालक ।

महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध।

विषय - मन

विधा - दोहा

स्वरचित ।


मन मेरा भंवरा हुआ,मौसम हुआ सिंदूर।

खुशियों का रस चूमता,गम से रहता दूर।।


मन पक्षी है बाबरा,भरना चाह उड़ान।

कैसे काबू में रखूं,देखन चाह जहान।।


मन को काबू में रखो,ये चंचल अति जान।

निग्रह इन्द्रिय का करो,करो ज्ञान का पान।। 

***


प्रीति शर्मा "पूर्णिमा "

08/10/2020

2️⃣

महाराष्ट्र कलम की सुगंध

8 अक्टूबर 2020

विषय-मन

विधा-कविता

*************************

ना समझ पाये कोई,

मन की गति अपार,

मन का कहना माने,

निश्चित होती है हार।


मन होता है चंचल,

मन कभी बाल मान,

अच्छे कर्म करने से,

बढ़ जाता है सम्मान।


मन के आगे ना चले,

मन जब चलता चाल,

कब होती है बेइज्जती,

कब करवा दे बेहाल।


मन को काबू कर ले,

बन सकता जन संत,

मन दरिया भांति बहे,

एक दिन होगा अंत। 

*************************

नितांत मौलिक एवं स्वयं रचित

***************************

होशियार सिंह यादव

मोहल्ला-मोदीका,कनीना-123027

जिला-महेंद्रगढ़,हरियाणा

मोबाइल-09416348400

3️⃣

🙏नमन मंच महाराष्ट्र कलम की सुगंध

विषय-मन

विधा-कविता

दि.8/10/20

मन के अँधियारे कोने में,

इक दीप जला दो यारो।

उजडे गुलशन की डाली पे,

कोई फूल खिला दो यारो।

इन्सॉ इन्सॉ का दुश्मन बन,

खूँ से प्यास बुझाता है ।

बनके फरिस्ता अमन चैन का,

प्रेम धार बहा दो यारो।

अन्धे बन के भटक गए जो,

उनका बेडा पार नही ।

अपने नेक खयालों से,

सही राह दिखा दो यारो।

नीरस जीवन से हार गए,

चेहरे पे मातम सा छाया।

उनके दुख चुनके दामन में,

कुछ खुशी लुटा दो यारो। 

            #सुशील#

🙏स्वरचित🌹

🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️

महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित विषय आधारित लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।


अनुराधा चौहान 'सुधी'

सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)


चित्र गूगल से साभार

Wednesday, October 7, 2020

धुंध/कोहरा


प्रथम स्थान

नमन मंच

कोहरा 

छन्द मुक्त

***

कोहरे के माध्यम से आज की समस्याओं और समाधान पर लिखने का प्रयास किया है 

कई शब्द अपने मे गहन अर्थ समेटे है आप की प्रतिक्रिया अपेक्षित है।

***

जब उष्णता में आये कमी

अवशोषित कर वो नमी

रगों में सिहरन का 

एहसास दिलाये

दृश्यता का ह्रास कराता 

सफर को कठिन बनाता है

कोहरा चारों ओर फैलता जाता है।

संयम से सजग हो

निकट धुंध के  जाओ..

 और भीतर तक जाओ

कोहरे ने सूरज नहीं निगला है

 सूरज की उष्णता निगल 

लेगी कोहरे को ।

सामाजिक ,राजनीतिक

परिदृश्य भी त्रास से

धुंधलाता जा रहा 

रिश्तों की धरातल पर

स्वार्थ का कोहरा छा रहा

संबंधों की कम हो रही उष्णता

अविश्वास द्वेष की बढ़ रही आद्रता

कड़वाहट बन सिहरन दे रही 

विश्वास ,प्रेम की  किरणें 

लिए अंदर जाते  जाओ

दूर से देखने पर 

सब धुंधला है

पास आते जाओगे 

दृश्यता  बढ़ती जायेगी

तस्वीर साफ नजर आएगी।


अनिता सुधीर आख्या

🏵️ प्रथम स्थान🏵️

नमन मंच

विषय-धुन्ध

6/10/20

विधा-छंदमुक्त



अलसाई सी सुबह

छाई उदासी

किरणे है रूठी

मुट्ठी में रेत

फिसलते समय

की तरह

शायद है कुछ भूली

या दिल मे कुछ दर्द

सहमी हुई सी

या रोका है किसी ने

टोका किसी ने

रोज आ जाया करती थी

अपने समय से

वक्त की पाबंद

स्वर्ण आभा युक्त

है इंतजार सभी को

या नीद नही खुली

धुन्ध की एक परत

छाई है चारो तरफ

किसी ने फैलाई

प्रदूषण की चादर

डरने लगी वो भी

बेटियों की तरह

मानव के करतूतों से

अपने स्वार्थ के लिए

कुछ भी कर सकता

आज का स्वार्थी नर

फिर बेटी हो या प्रकृति.....


स्वरचित

मीना तिवारी

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द्वितीय स्थान

महाराष्ट्र कलम की सुगंध मंच को नमन 

विषय: कोहरा 

दिनांक :६-१०-२०२०


"आज फिर थी वह मैंने छूना चाहा"

**************************

कल मैंने देखा चौराहे पर एक दुखियारी कुछ बुदबुदा रही थी लोगों के आगे गिड़गिड़ा रही थी बच्चा था उसका भूखा , दूध का पैसा जुटा रही थी..........

कुछ उस पर मुस्कुराते कुछ दुत्कार 

कर जाते रहे कोई न समझा व्यथा उस दुखियारी की ..........

शाम हुई लौट चली घर वह खाली हाथ, आज फिर थी वह उसी चौराहे पर, मगर आज बच्चा भूखा नहीं, दुनिया में ही नहीं था..... और

वह कफन का पैसा जुटा रही थी।

गुमसुम थी वह मगर देखते देखते उसके सामने पैसों का ढेर हो गया ..........

कोहरा हो जाना चाहा, जब देखा उस के सानिध्य में धरती आकाश एक हो गए नदी पहाड़ भी एक सभी ढक गए धुंध में....

सड़कों पर आहिस्ता चली बसें, आज मित्रों ने दूर से हेलो नहीं कहा, वे निकट आकर मिले इसीलिए मैंने कोहरा होकर जीना चाहा रूप विहीन ,गंध विहीन, आकार विहीन.........

छूना चाहा एक साथ धरती गगन को, नदी पहाड़ को और यह संभव है सिर्फ कोहरा बनकर!!✍️✍️


         **प्रतिभा पाण्डेय प्रयागराज उत्तर प्रदेश

🏵️द्वितीय स्थान🏵️

नमन 

महाराष्ट्र की क़लम सुगंध 

विषय ...धुंध / कोहरा 

06-10-20 


चारों तरफ है़ धुंध कोरोना , 

स्पष्ट नजर नहीं कुछ आता । 

मौसम का धुंध तो छट जाता , 

पर आज का धुंध न छट पाता । 


कोरोना के ये भयावह धुंध ने , 

सारे विश्व को दूषित कर डाला । 

वर्तमान और क्या भविष्य है़ , 

अब ये लक्षित ना हो पाता । 


अपराधों का ये घृणित कोहरा , 

ना जाने कब ये बीतेगा ? 

किस दिन सूरज ताप प्रज्वलित , 

जिससे ये कोहरा पिघलेगा । 


घुटन सहन करते हैं हम सब , 

इस धुंध में सांस भी दुर्लभ है। 

मक्खी मच्छर सी मौत हो रहीं , 

प्रदूषण धुंध की बनी अमानत है । 


खतरे के धुंध से बचना है, 

तो प्रकृति स्वच्छ बनानी है। 

हरियाली चहुँ दिशि विस्तृत हो, 

तव ही अब जान बचानी है़ । 


स्वरचित सुधा चतुर्वेदी मधुर 

                       मुंबई

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तृतीय स्थान

नमन मंच

विषय- धुंध/ कोहरा

6/10/2020


"कोहरा "

आज छाया है कोहरा

हर देश पर यहाँ

कहीं पर है कोरोना

तो आतंक भी है वहाँ

लोग भयभीत हो चुके

कोरोना और आतंक से

दिल पर छाया है अंधेरा

आगे बढ़ना है ठहरा

लेकिन जिंदगी का फलसफा

यही तो करता है बयां

हर कोहरा छट जाता है

जब विश्वास का हो उजाला

कम न होने पाये

विश्वास खुद से अब यहाँ

छट जायेगा ये कोहरा

जो है आज छाया हुआ

हो कोरोना या आतंक फिर

हार कर ही जाएगा

विश्वास के सूरज के आगे

हर कोहरा छट जाएगा

©®धीरज कुमार शुक्ला "दर्श"

झालावाड़ राजस्थान

🏵️तृतीय स्थान 🏵️

महाराष्ट्र कलम की सुगंध

जय-जय श्री राम राम जी

6/10/2020/मंगलवार

*धुंध/कोहरा*

क्षणिका

----1----

धुंध छाई आसमान में

दिखाई नहीं देता 

कुछ भी मुझे

क्यो कि मनमंदिर में 

अंधेरा छाया है।

-----2-----

अंधेरा कोहरा छाया हुआ

कैसे दिखें सुंदर राह

साफ निर्मल करें

बुहारे अपने घर की आंख

धुंधले नहीं दिखें सुंदर नजारे।


स्वरचित

इंजी शंम्भू सिंह रघुवंशी अजेय

गुना म प्र

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सराहनीय प्रस्तुति

1️⃣

नमन मंच

दिनांक - ०६/१०/२०२०

दिन - मंगलवार

विषय - धुंध/कोहरा

विधा - छंदमुक्त

-----------------------------------------


फैली है धुंध की चादर

हर तरफ फ़िज़ाओं में

हवाओं में घुले हैं महीन धूल कण

दिखता नहीं कुछ भी स्पष्ट

झीनी चादर सी बिछ गई जैसे चारों ओर

संभलता, चेतता नहीं है आदमी

जाने अंजाने रूप में

लापरवाह सा करता रहता है गलतियां

फैलाता है प्रदूषण

करता है पर्यावरण को दूषित

सोचता नहीं भविष्य की

वाहनों, चिमनियों से निकलते जहरीले, जानलेवा धुएं

खेतों में जलती परालियां

जलता कूड़ा - कचरा, प्लास्टिक

धूल और धुएं का ग़ुबार है

सांसें हलक में ही अटक कर रह जाती हैं

घुटता है दम ऐसे माहौल में

मजबूर हैं सब लोग

घुटन भरी जिंदगी जीने को।


रिपुदमन झा 'पिनाकी'

धनबाद (झारखण्ड)

स्वरचित

2️⃣

🙏नमन मंच महाराष्ट्र कलम की सुगंध

विषय-धुंध/कोहरा

विधा-पद्य

दि.6/10/20

#दास्ताँ$

ये रिश्ते भी कितने अजीब से होते है।

कुछ बनाए खुदा कुछ नसीब से होते है।

अपनों मे पराया बेगानों मे अपनापन,

कोई धन के धनी मन के गरीब होते है।

लहु और दूध के कोई इंसानियती रिश्ते,

कुछ बहुत दूर के कुछ करीब से होते है।

प्यार,नफरत,छल,कपट और दम्भ के,

आस विश्वास के कुछ फरेब से होते है।

छा गई है धुंध सी,रिश्तों की कायनात पे,

हर रिश्तों के वजूद तहजीब से होते है।

🌹स्वरचित🙏

🌷सुशील शर्मा🌹

3️⃣

६/१०/२०२०/मंगलवार

नमन मंच

"महाराष्ट्र कलम की सुगंध "

विषय-धुंध/कोहरा

विधा-कविता

- - - - -

        *मक्कारी *

कोहरे की चादर में,कौन है सोया हुआ?

बर्फ सा ठंडा तन,मृतप्राय सा पडा हुआ।

नम है ओशों से,क्या आकाश भी रो रहा!

जीवन -भर ये दुख दर्द ही सहता रहा।

सबने इसको लूटा,बस ये लुटता ही रहा।

अंत समय में,न कोई इसके काम आया।

पानी की बूंद-बूंद,अच्छे खाने को तरसाया।

जीवन भर कमाई पेंशन भी सबने खाया।

सेवा करने की बारी आई,तो ठेल दिया।

तड़प -तड़प कर,इसे मरने को छोड़ दिया।

अरे! शर्म करो,उसकी लाश पड़ी हैअभी।

और तुम सभी को गम नहीं,हंस रहे हो सभी।

           * * *

*"नीलम पटेल" प्रयागराज *

(स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित रचना)

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महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित विषय आधारित लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।


अनुराधा चौहान 'सुधी'

सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)


चित्र गूगल से साभार

सफर


 प्रथम स्थान
नमन मंच
7/10/20
विषय-चित्रलेखन
विधा-छंदमुक्त

आज से पहले
सड़को को इतना
वीरान नही देखा
इस कदर गरीबो को
अपने जज्बात छुपाते नही देखा।
बेचता था जो गुब्बारे
कभी अपनी सांसो को भर
आज उन्ही सांसो को
टूटते हुए देखा।

हालात इतने बदले
भूख की बेसब्रियो के
अनाज के खाली डिब्बो में
कीड़ो को दम तोड़ते देखा।

रोज की तरह
गमछे को बना मास्क
जाता है काम की लेकर आस
क्या खिलाऊँगा अब
ये सोच एक बाप को
जार जार रोते देखा।

माँ भूख लगी देदे कुछ
बेटा आने दे बापू को
दिलासा देती 
माँ को आँसू पीते देखा।

आन लाइन पढाई
बन गई मजबूरी
कैसे पढेंगे हम
गरीब बच्चों को 
एक झलक फ़ोन के लिए
तरसते हुए देखा।

बचा हुआ खाना 
फेकते है कितनी आसानी से
भूखे नंगे बच्चो को
पत्तल को चाटने की
चाहत को देखा।

कोरोना की मार कम थी
बाढ़ और बारिश
की वीभत्स संहार से
अपनी ही झोपड़ी में
खुद को छुपाते देखा।

तन बदन की नग्नता को
फटी साड़ियों से
युवतियों को
दरिंदो से अपनी आबरू 
बचाते हुए देखा।

पैदल चलकर
अपनी जीवन की बची साँसे ले
आंसू पीकर
चिलचिलाती धूप में
रोटी की आशा से
अपनो के करीब 
लंबा सफर तय करते देखा।

स्वरचित
मीना तिवारी
पुणे महाराष्ट्र
🏵️ प्रथम स्थान🏵️
नमन मन्च 
गीत-" इस तरह दर्द कागज से लिपटा रहा "
सर्वाधिकार सुरक्षित 

शब्द मिलते रहे गीत लिखता रहा 
इस तरह दर्द कागज से लिपटा रहा
हादसों में गुजारी है सारी उमर 
फिर भी कट न सका जिन्दगी का सफर 
भावना मिट गयी अर्थ बिकता रहा
शब्द मिलते रहे गीत लिखता रहा 
साजिशें करते करते मेरे हमसफ़र 
लूट लेते हैं दिल बनके वो रहगुजर 
 आह भरते रहे दर्द होता रहा 
शब्द मिलते रहे गीत लिखता रहा 
ख्वाहिशें जिन्दगी भर खतम न हुई 
मर गये जो मुहब्बत तो कम न हुई 
अश्क गिरते रहे गम उठाता रहा
शब्द मिलते रहे गीत लिखता रहा 
मैंने मिलकर खुदा से दुआ मांग ली
कितनी हैरत है तुमसे वफा मांग ली
जख्म मिलता रहा कष्ट होता रहा
स्वरचित-अभिषेक मिश्र 
केशव पण्डित
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द्वितीय स्थान
नमन 
महाराष्ट्र क़लम के सुगंध 
विषय ....सफर 
07-10-20 बुधवार 

जीवन शैली इतनी सरल सहज नहीं होती, 
जन्म से मृत्यु तक जीवन का सफर पाना है । 
कंकरीली पथरीली संघर्षमयी राहें हैं , 
हौंसला से ही सफर की राह बनाना है। 

जीवन के संघर्षों से मन संकुचित मत करो , 
संघर्षों के बाद ही जोशीलि आंधी आती है । 
देखते हो सागर की खामोशी के हौंसले,  
उसमें कितने तेज ज्वार भाटे ले आती है। 

बया का हौंसला देखो तिनके बीन लाती है, 
तिनके तिनके से अस्थिर घोंसला बनाती है। 
मुँह में दाना भरके बच्चों की परवरिश करती है़ , 
पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान भरती है़ । 

हौंसले से अज्ञानी कालिदास ने ग्रंथ लिखे , 
इसके बिन तुलसी तुलसीदास न बन पाते । 
होंसला न होता तो वाल्मीकि महान ना होते , 
होंसले से राम जी वनवास भी न जा पाते । 

कोई भी राह हो कैसी भी दास्ताँ हों कभी , 
हमको अपने हौंसले से सफर स्वयं चुनना होगा । 
प्रतिभा कभी मोहताज नहीं होती किसी हाल में , 
शून्य से हजार तक हमको ही गिनना होगा । 

स्वरचित सुधा चतुर्वेदी ' मधुर ' 
                    ....मुंबई
🏵️ द्वितीय स्थान🏵️
नमन मंच
महाराष्ट्र कलम की सुगंध
दिनांक 7/10/2020
विधा-छन्दमुक्त कविता
शीर्षक-सफर

जिन्दगी इक सफ़र है चलते रहिए
फुरसत में डी पी बदलते रहिए।

आंधी, तुफान ,बादल का करता,
बस सूरज की तरह चमकते रहिए।

जीवन मिले चार दिन ही सही,
सूखे गुलाब की तरह महकते रहिए।

सुख-दुख की फ़िक्र बहुत कर लिया
जीवन के फिहलपट्टी पे फिसलते रहिए।

आज कल के चक्कर में आधी उम्र गई,
सुबह पानी पीकर टहलते रहिए।

जीना हो जाएगा बड़ा आसान,
बस हालात के साथ ढलते रहिए।

नूरफातिमा खातून नूरी
जिला-कुशीनगर 
उत्तर प्रदेश
मौलिक/ स्वरचित
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तृतीय स्थान
नमः मंच- महाराष्ट्र कलम की सुगंध
तिथि-7-10-2020
विषय- सफर
**********

सफर जिंदगी का हो या
अपनी-अपनी सोच का
सब सही होता है क्योंकि 
वो उसका तय किया होता है।
सफर लम्बा भी होता है
पथरीला,कटीला और गहरा भी
हरियाली, फूलों वाली
कहीं चार पगडंडियों का मिलन
और कहीं ठहरी सी एक गली।
सफर सोच का हमारा ऐसा ही तो होता है
किसी के लिए फुलों जैसा
किसी के लिए कांटों जैसा
अपनों जैसा तो किसी के लिए अनजानों जैसा।
यह सफर तो चलता रहता है
दोस्तों में, परिवारों और रिश्तेदारों में।
यह सफर कहीं तो ठहर सी जाती है
कहीं बिखर कर अलग हो जाती है
किसी के पास हों जाती है 
तो किसी से बहुत दूर हो जाती है।
सफर इसी का नाम है
चलते रहना है हम सभी को
मंजिल अपनी तय करनी है
मिलना और बिछड़ना
सुख और दुःख का होना
जीवन में यह सब दिन आता जाता रहता है
सामना करते रहना है आगे बढ़ते रहना।
शायद सफर इसी का तो नाम है।।

स्वरचित
विभा झा
रांची झारखंड।
🏵️तृतीय स्थान🏵️
महाराष्ट्र कलम की सुगंध
7 अक्टूबर 2020
विषय-सफर
विधा-कविता
*************************
सफर सुहाना होता है,
जब हों संग में साथी,
दूर बैठा हो साथी तो,
भेजों लिखकर पाती।

सफर दुष्कर बनता,
जब हो लंबा सफर,
दर्द हजारों मिलते हैं,
भजते रहते हर हर।

सफर पहाड़ों का हो,
रोमांच भर दे शरीर,
फूलों का सफर हो
हर ले मन की पीर।

सफर सफर ही हो,
चाहे नजदीक, दूर,
सफर नाम सुनकर,
घट जाता तन नूर। 
*************************
नितांत मौलिक एवं स्वयं रचित
***************************
होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका,कनीना-123027
जिला-महेंद्रगढ़,हरियाणा
मोबाइल-09416348400
🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
सराहनीय प्रस्तुति
1️⃣
नमनमंच संचालक ।
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध।
विषय -सफर
विधा - सायली छन्द
स्वरचित 

सफर 
जिंदगी का
यूं गुजर गया
उड़ गया
कपूर।। 

सफर
रूक गया
जब गयी मुहब्बत
छोड़कर मुझे
तन्हा।। 


प्रीति शर्मा "पूर्णिमा"
07/10/2020
2️⃣
नमन मञ्च🙏🌻✍️🎄
विषय-सफर

सावधान !
युग बदल रहा है।
खबरदार !!
जमाना खराब है।।
होशियार !!!
कार्य प्रगति पर है ...
सफर जारी रहे
आगे अंधा मोड़ है
इस हेतु सतर्क रहें
नजर हटी
 कि
दुर्घटना घटी
💐💐💐💐💐💐💐💐
स्वरचित मौलिक

श्रीरामसाहू"अकेला"
✍️🌻✍️🌻✍️🌻✍️🌻
3️⃣
नमन मंच-महाराष्ट्र कलम की सुगंध
तिथि-07/10/2020
विषय-सफर 

सुख दुख हैं दो किनारे
*****************

जीवन एक सफर है
सुख-दुख उसके दो पड़ाव हैं
जहाँ ठहरना और आगे बढ़ना है
न दुख कभी टिकता है 
न सुख कहीं ठहरता है
फिर मन भारी क्यों करता है?
बढ़ते चलो,बढ़ते चलो
चलना ही जिन्दगी है
जीवन एक नदी है
उसकी अपनी रवानगी है,बहाव है
उसे तो अविराम बहते जाना है
सुख-दुख उसके दो किनारे हैं
जो सदैव बराबर साथ चलते हैं
जीवन सुख-दुख का आंगन है
इसमें ही हमें जीवन बिताना है।

स्वरचित
अनिता निधि
जमशेदपुर,झारखंड
4️⃣
महाराष्ट्र कलम की सुगंध को नमन
विषय :सफ़र
दिनांक:७-१०-२०२०

जिंदगी के लंबे सफर तय करना आसांन नही
हर किसी को हमसफ़र चाहिये
वह न केवल पत्नी ही साथ मां बाप भाई बहन या कई 
हमख्यालात मित्र व एक प्यारा परिवार चाहिये
और साथ अपना खुद का 
लुभावना ख्याल और एक सुविचार चाहिये!!

पर एक बात तय है जीवन के फासले अकेले कटना कठिन है
इसे तय करने कोई तरफदार के साथ साथ तलबगार चाहिये!!!

अकेला चना भांड नहीं फोड सकता
जीवन की असहजता और असुविधा को निपटने के लिए एक सरल सतह आधार चाहिये
जिंदगी के लंबे सफर तय करना 
आसान नहीं 
हर किसी को साथ में हमसफ़र चाहिये!!

स्वरचित :अशोक दोशी
अभी अभी
सिकन्दराबाद
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महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित विषय आधारित लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र गूगल से साभार

Tuesday, October 6, 2020

स्वप्न/ ख्वाब

प्रथम स्थान
विषय आधारित सृजन
05-10-20
नवगीत------

स्वप्न केवल
स्वप्न बनकर
हो गया बेकार तो ।

एक पग तुमको
बढ़ाना है
दृढ़ विश्वास रखकर
हारना क्यो
चाहता तू
लक्ष्य के नज़दीक आकर
मानता हूँ
थक गया पर
रुक न धीरे ही चलाचल ,
लड़ गया जब
तू अँधेरों से
न मानी हार तो ।

दर्द तो पाता
मनुज है
दर्द से आश्वस्त हो ले
एक कोने में
कहीं पर
दर्द हो तो खूब रो ले 
किन्तु तेरा
जीतने का
प्रण न हो कमज़ोर क्योंकि
त्याग सुख को
सह लिया जब
दुर्दिनों की मार तो । 

सुन यही
अवलेहना तो
पुष्प की माला बनेगी
जीतना तेरा
हुआ क्या
सारी दुनिया चल पड़ेगी
राह पे
तेरे चलेंगे
कारवाँ के कारवाँ जब
फूल बनकर
खिल उठेंगे
दुखभरे अंगार तो ।

        ✍रकमिश सुल्तानपुरी
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द्वितीय स्थान
नमन मंच
05/10/20
ख्वाब
छन्द मुक्त

ख़्वाब...
ये चाह थी मेरी, तुझे छूकर कभी देखूँ
हसरतें अधूरी ,तुझे जी भर के जी लूँ ।

तुझमें वो हकीकत बन इक रोज आये थे
सफेद लिबास में वो मन को बड़ा भाये थे
समंदर का किनारा था ,रेत के घरोंदे थे
पत्थरों पर बैठी थी,सुर्ख गुलाब वो लाये थे।
लहरों का यूँ कदमों को चूम चले जाना
ठंडी मस्त बयारों का यूँ सरगोशियाँ करना..
क्षितिज के पार यूँ सूरज का ढलते जाना...
उनका धीमे से मेरे काँधे को यूं छू लेना...

ख़्वाब में देखे हकीकत को जी रही हूँ
उस छुअन को आज भी महसूस कर रही हूँ

उनके ख्वाबों में जाकर मेरी याद दिला देना
बरसों से मै सोई नहीँ ,उनको जा बतला देना
वो अब तक कैसे है ,उनकी सुध लेते आना
हसरतें मिलन की हुई पूरी,ख्वाबों को छू कर जाना ।

अनिता सुधीर आख्या
🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
तृतीय स्थान
महाराष्ट्र की कलम सुगंध मंच को नमन
विषय
स्वप्नों/ख्वाब
०५/१०/२०२०जीवन के स्वप्न

स्वप्न
सुनहरे
जीवन के,
हो जाएँ साकार।
मानव को मानव
जन से,रहे सदा ही प्यार ।
ऊँच-
नीच का
भेद हमारा,
जड़ से ही मिट जाये।
छल-कपट -सा दुर्गुण ,
जग में,कभी न आने पाये।
सच्चाई
का स्वर्ण पताका ,
जग -भर में लहराए ।
झूठ , फरेब, मक्कारी,
जल के बुलबुले -सा ढह जाए।
शान-घमंड
विद्वेष-भावना,
कभी न आए पास।
सब पर सबको मोह
रहे, सबपर सबको विश्वास।
पर
हितकारी
कार्य में, तनिक
न हमको संशय हो।
सुख पहुँचाऊँ, सदा,
सभी को ,मन में दृढ़ निश्चय हो ।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
               स्वरचित ( मौलिक )
🏵️तृतीय स्थान🏵️
नमन मंच
दिनांक - ०५/१०/२०२०
दिन - सोमवार
विषय - स्वप्न/ख्वाब
----------------------------------------

ख़्वाब....
शीशे से नाज़ुक,
फूलों से भी नर्म
कांटों सी चुभन भरे
कभी जागते तो कभी सोते
बंद और खुली आंखों में पलते
रात दिन खिलते, महकते ख़्वाब
अच्छे - बुरे, झूठे - सच्चे
कभी चटक कर टूटते
कभी बिन सोचे ही सच होते
बेरंग जीवन में बहार लाते
टूटते, बिखरते उम्मीदों को
समेटते और संवारते
क़िस्मत की ठोकरों के बाद
संभलने और फिर से चलने का हौसला देते
नामुमकिन को मुमकिन बनाते।
ख़्वाब ही तो हैं जो
ज़िन्दगी को नया मकसद देते हैं
जीना सिखाते हैं
तूफ़ानों से, परेशानियों से लड़ने की, जूझने की
बेपनाह हिम्मत देता है ख़्वाब।

रिपुदमन झा 'पिनाकी'
धनबाद (झारखण्ड)
स्वरचित
🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
सराहनीय प्रस्तुति
🏵️1️⃣🏵️
नमन मंच 🙏
महाराष्ट्र क़लम की सुगंध
विषय .....स्वप्न / ख्वाब
05-10-20 सोमवार

सपने की विधा कई होतीं ,
सुप्तावस्था सपने होते ।
एक जाग्रत में ही दीखते हैं ,
ख्वाबों के रूप में वो होते ।

बातें मस्तिष्क में छिप जातीं ,
वो समय समय पर झांकती हैं ।
और सुप्तावस्था में उठतीं ,
सपने का रूप वो बनतीं हैं ।

जाग्रत का सपना सच होता ,
वास्तव में जो करना चाहें।
कोशिश साहस से वो सपने ,
साकार रूप में बन जायें।

कभी धन दौलत कभी महल बड़े ,
कभी है विलासता की चाहत ।
ये सपने सब साकार हुए ,
जब हम करते ताकत से श्रम ।

सपने तो देखना बेहतर है़ ,
देखेंगे तभी कोशिश होंगीं ।
साकार रूप उनको मिलता ,
अपनी खुशियां शामिल होंगीं ।

स्वरचित .सुधा चतुर्वेदी मधुर
  . मुंबई
🏵️2️⃣🏵️
महाराष्ट्र कलम की सुगंध
स्वप्न/सपने

स्वप्न हुए साकार आओ खुशियाँ मनालें हम।
गिले-शिकवे भूलकर सबको गले लगालें हम।

सूरज की रोशनी से चारों ओर उजियारा है,
रात का सन्नाटा दीपक से तम मिटालें हम।

पुष्प खिल रहे चमन में नित-नई पल्लव लेकर,
महकते फूलों की खुश्बू, वाटिका सजालें हम।

राह बहुत कठिन मगर उन कांटो पे क्या चलना,
पुष्प बिछे है राहों में मिलकर कदम बढ़ालें हम।

सुख-दुख, धूप-छांव जीवन में दस्तक देती है,
अवसादों को छोड़ खुशी का माहौल बनालें हम।

सुमन अग्रवाल "सागरिका"
      आगरा
🏵️3️⃣🏵️
महाराष्ट्र कलम की सुगंध
विषय- स्वप्न/ख्वाब
दिनांक-5/10 /2020

"स्वप्न"
स्वप्न ही तो रह गया
भारत में अब
इंसानियत का दिखना
मजहबी हो गये हैं सब
यही सच का सामना
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे में
करते हैं दान मिलकर
लेकिन कम पड़ जाता है
जब मदद करनी हो
इंसान की
स्वप्न ही तो है
ये देश हमारा
जहाँ खर्च हजारों होतें है
जुएं और शराब पर
लेकिन दम घुटता है सबका
मदद करने के नाम पर
आज यहाँ पर सस्ती
जिंदगी है सबके लिए
जुएं, दारू और ड्रग्स
ये जरूरी है सबके लिए
स्वप्न नहीं है ये
की हम बर्बाद हो रहे
जिंदगी को मिटाने में
हम खुद ही खो रहे
मानवता को शर्मसार करता
एक घिनौना सच है ये
भारत नहीं बचेगा अब
स्वप्न नहीं है ये
मर चुकी है आत्मा
लाशें बची है यहां
बस जमीन का टुकड़ा महज
रह गया है हिन्दुस्तान
©®धीरज कुमार शुक्ला "दर्श"
झालावाड़ ,राजस्थान
🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित विषय आधारित लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र गूगल से साभार

Sunday, October 4, 2020

चित्र लेखन

प्रथम स्थान
महाराष्ट्र कलम की सुगंध
जय-जय श्री राम राम जी
चित्र लेखन
3/10/2020/शनिवार
*बढ़ते कदम*
काव्य

चलते रहें बढ़ते रहें कदम।
संघर्ष करें नहीं कोई ग़म।
ये जीवन मिला जीना हमें,
हम आगे बढ़ें कैसी शरम।

लक्ष्य जो निर्धारित किया है।
सदैव हमने हासिल किया है।
पीछे मुड़कर देखा नहीं,
होंसला हमने उसने दिया है।

प्रेम प्रीत से मिलकर बढ़ेंगे।
हम रुकावट से नहीं रुकेंगे।
वैमनस्य वैरभाव नहीं तो,
हम शिखरों को चूमते रहेंगे।

काल ऊषा हो या फिर संध्या,
उजाला हमें मिलता रहेगा।
शिक्षा जुड़े संस्कार संस्कृति,
हम प्रगति करें अवसर मिलेगा

चलें एकला या सहयोग से,
उन्नति का प्रयास करते रहेंगे।
क़दम अग्रसर हो चुके हमारे,
निरंतर हम बढ़ते ही रहेंगे।

स्वरचित
इंजी शंम्भू सिंह रघुवंशी अजेय
 गुना म प्र
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द्वितीय स्थान

नमनमंच संचालक ।
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध।
विषय - चित्रलेखन ।
विधा - दोहा।
स्वरचित

देता है पैगाम ये,
डूबे सूरज रोज।
ऐसा मानव जीवना,
नहीं रहेगा ओज।।

हैं मुसाफ़िर सभी यहां,
रहा हमेशा कौन।
आत्म आई जिस जहां,
जाये फिर हो मौन।।

समझ मुसाफ़िर बात ये,
चलाचली की बेर।
करम कर पुण्य कमाले,
पछतायेगा फेर।।
****

प्रीति शर्मा "पूर्णिमा"
03/10/2020
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 तृतीय स्थान
नमन मंच
महाराष्ट्र क़लम की सुगंध
विषय ....चित्र लेखन
03 -10-20 शनिवार

चल बढ़ चल तू उन्नति पथ पर ,
मत घबड़ा तू सुनसानी राहों से ।
दुनियाँ तुझको गर खींचे भी तो ,
सतत धैर्य प्रयास थाम तू चल।
चल बढ़ चल तू उन्नति पथ पर ..

मत विचलित हो मत व्याकुल हो,
तू स्वयं निज कर्म में आतुर हो।
अपने पथ पर ध्यान केंद्रित कर ,
तू अथक परिश्रम करता चल ।
चल बढ़ चल तू उन्नति पथ पर ..

तुझको जब उन्नति हवा है़ चूमेगी ,
तेरे द्वार सफलता मद में झूमेगी ।
अभिमान की छाया तू मत छूना ,
तू जगत की परिचर्चा को तज ।
चल बढ़ चल तू उन्नति पथ पर ...

मेहनत का रंग बेहद सुन्दर होता ,
संतोष का अद्भूद फल मीठा होता ।
जब मानव अथक श्रम प्रयास करे,
उस श्रम बिंदु से तू फल सिंचित कर ।
चल बढ़ चल तू उन्नति पथ पर ..

स्वरचित सुधा चतुर्वेदी मधुर 
                        मुंबई

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सराहनीय प्रस्तुति

1️⃣
नमन मंच
दिनांक - 3-10-2020
विषय - गजल
उससे जियादा जहाँ में कोई सगा नहीं था,
मगर मेरे इश्क का कोई फलसफा नहीं था!!

हम जानतें हैं तुम्हारे शहर की रवायत भी
इक इश्क के सिवा वहाँ क्या क्या नहीं था!!

बन के बैठा रहा तू रकीबों का हाकिम
 इबादत मैं भी करता पर तू खुदा नहीं था !!

लौट आते हैं परिन्दें भी शाम को घरों में
तू गया ही क्यूँ जब मुझसे खफा नहीं था !!

सजदे में सर हम भी रख देते पर क्या करते
तेरा वजूद भी तो औरों से जुदा नहीं था!!

तुम तो खामखाँ गमों की नुमाईश करते हो
उसका इश्क बेवफा था वो बेवफा नहीं था!!

स्वरचित-अभिषेक मिश्र (केशव पण्डित)
2️⃣
मंद मारुत बहने दो,
------------आज का चित्र शीर्षक कदम
वसुधा पर,
हमने जन्म लिए
मनुज जीवन पाया
जीवन गीत गाने दो,
मत रोको मुझे
मेरी वाणी को कहने दो
पत्थरों पर सोई,
प्रतिमा को ,
नये रुप रचने दो।।
सूनी आँखोँ में,
नये नये सपने सजने दो।।
रुके कदम को,
मंजिल को बढ़ने दो।।
मुक्त पवन सा
मुझे वसुधा पर बहने दो।।
बीते पल जो,
बीत गये प्रिय,
रुठे अधरों पर,
शब्दोँ के मीठे गीत सजने दोःः
वसुधा पर मानवता के,
मंद मंद मारुत बहने दो।।
रचनाकार स्वरचित देवेन्द्र नारायण दास।।3/10/2020।।
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महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित विषय आधारित लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)
चित्र गूगल से साभार

पर्वत/पहाड़

प्रथम स्थान
महाराष्ट्र कलम की सुगंध
विषय-पर्वत
४/१०/२०
पर्वत पर चार वर्ण पिरामिड रचनाऐं।

मै
मौन
अटल
अविचल
आधार धरा
धरा के आंचल
पाया स्नेह बंधन।

ये
स्वर्ण
आलोक
चोटी पर
बिखर गया
पर्वतों के पीछे
भास्कर मुसकाया।

हूं
मै,भी
बहती
अनुधारा
अविरल सी
उन्नत हिम का
बहता अनुराग।

लो
फिर
झनकी
मधु वीणा
पर्वत राज
गर्व से हर्षाया
फहराया तिंरगा।

कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'
🏵️प्रथम स्थान🏵️
नमन मंच 🙏
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध।
विषय - पर्वत/पहाड़
विधा - कविता
स्वरचित
       शीर्षक : "लक्ष्य पाने के लिए"
          *********************
संकल्प का एक दीप लेकर
प्रगति पथ पर अग्रसर
फटे हम चल पड़े
 पर्वत भी राहों पर अड़े
किंतु न हम हार कर
हर आफतों को मारकर
लक्ष्य पाने के लिए
आगे चले आगे चले
          आसमां फटने लगे
          पर्वत कहर बन के गिरे
          संधान कर लेंगे दिशा
          चाहे घोर हो काली निशा
       जालिम का रुख हम मोड़कर                             
         लक्ष्य पाने के लिए
         आगे चले आगे चले
चिलचिलाती धूप हो
तमतमाया रूप हो
सामने शोले पड़े
 या शीत में ओले पड़े
रास्तों में पर्वतों की
भांति हों रोड़े बड़े
   अप्सराओं की सुरभि से
    आप जो हिलने लगे
   मन हरिण को मोड़ कर
 पर दुख जगत का बांटकर
माया के बंधन तोड़ कर
हर ऐशो एब छोड़कर
लक्ष्य पाने के लिए
आगे चले आगे चले !!!!✍️✍️✍️
               ‌
‌‌प्रतिभापाण्डेय प्रयागराज उत्तर प्रदेश
🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
द्वितीय स्थान
नमनमंच संचालक ।
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध।
विषय - पर्वत/पहाड़
विधा - कविता
स्वरचित।

पहाड़ हैं खूबसूरती के घर।
लग रही इनको किसी की नजर।।

प्राकृतिक सौन्दर्य बिखरा दूर-दूर।
खजाना भी इनमें भरा भरपूर।।

वन नदियां इनकी बढ़ाते हैं शोभा।
जड़ी-बूटियों के यहां मिलते हैं पौधा।।

कल-कल बहता झरनों का पानी।
छन-छन आती वादियों में किरण सुहानी।।

सूरज की किरणें करती बसेरा।
खूबसूरत होता है यहां हर सबेरा।।

सांझ ढले अस्त सूरज की अप्रतिम लाली।
और चारों ओर घाटियों में छाई हरियाली।।

सिहरन जगाती महकी ठंडी हवायें।
मस्ती जगायें दिल सुंदर फिजायें।।

तीर्थों के मेले ऋषि-मुनियों की तपोस्थली।
हर मन को मोहती शान्तिमय वनस्थली।।

सुख और शांति का अनुपम खजाना।
पहाड़ों में जिनका बसा आशियाना।।

मेहनतकश लोग और सरल उनका जीवन।
भौतिकता से दूर और संघर्षों से तपा तन-मन।।

जाते हैं जब जब भ्रमण को पहाड़ों में हम।
उसके दैवीय सौन्दर्य में रूह हो जाती है गुम।।

कहते हैं प्रकृति के जितने नजदीक जाओगे तुम।
सच है यह आध्यात्मिक अनुभूति पाओगे तुम।।

फिर परमात्मा को अपनी रूह के समीप पाओगे तुम।
लौट तो आये हम पर आज भी वहां बसती है रूह।।
****
प्रीति शर्मा "पूर्णिमा"
04/10/2020
🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
तृतीय स्थान
नमन मंच 🙏
महाराष्ट्र क़लम की सुगंध

04-10-20---रविवार
विषय ....पत्थर / पहाड़

टूट कर  गिरा पहाड़ से पत्थर ,
  प्यारा घऱ बना के देता है ।
    भावों की छत्रछाया परिवार को देता,
         मानव की आन को मान देता है।

भारतीयों की आस्था विश्वास देखो ,
  पाहन  का नाम पूज्य  गिरिराज देखो। 
   चलते औजार जब पत्थर की छाती पर ,
    उसका निखरता रूप भगवान कीमूरत देखो ।

मानव ! तू पत्थर दिल किस काम का,
     अपना ही  परिवार बिगाड़ करता है ।
         पत्थर की आन बान शान जान,
             जिसमें तू जिन्दगी भर बसर करता है ।

तुम पत्थर का उच्च  शिखर  देखो,
  मौन का   सख्त प्रतिरूप बना।
     चुप्पी    कितनी  बलशाली है,
        पत्थर  ताकत का रूप बना ।

मत चलाना वाणी का पत्थर तुम,
     दिल में खूनी घाव करता है ।
       मधुर दिल काँच से बिखर जाते ,
         तुमको भी नाम से बदनाम मिलता  है ।

स्वरचित   सुधा चतुर्वेदी ' मधुर ' 
                   ..मुंबई
🏵️ तृतीय स्थान🏵️
४/१०/२०२०/ रविवार
नमन मंच💐
"महाराष्ट्र कलम की सुगंध"
विषय-पर्वत/पहाड़
विधा- कविता
- - - -   
       *सुरम्य-स्थल *
ऊँचेअमल धलव पर्वत
  शिखर हिमांचल।
  स्वर्णिम किरणांचल
    विकीर्ण गिरि,पर।
 इर्द- गिर्द हरित शैवाल
      दरी बिछी,सी।
दुर्गम बर्फीली मनभावन
      सुन्दर घाटी।
नभ-चुंम्भी कैलाश पर्वत 
         शीर्ष पर।
ऊँचे-ऊँचे साखू सागौन
        वृक्ष देवदार।
 रंग-बिरंगे फूल सुगंधित 
       इत्र बनकर।
महक मदमय होरही,मलय
        में घुलकर ।
 खिले श्वेतपद्म,मानसरोवर
        के पवित्र जल।
विराजमान हों सरस्वती जैसे
         वीणा लेकर।
कस्तूरीमृग होकर उन्मादित
            पर्वत पर,
निज नाभिसुगंध से विचलित
       धावत हरपल।
कलकल,छलछल नदियों का
          मृदुल जल।
प्रस्फुटित शिलाओं से झरते
          झरने निर्झर।
बहुरूपणी नदियाँ श्वेतमुक्त
           माला सी,
इठलातीं,बलखाती,लहरातीं
        घाटी वक्षपर।
*"नीलम पटेल" प्रयागराज *
(स्वरचित,मौलिक, अप्रकाशित रचना)
🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
सराहनीय प्रस्तुति
1️⃣
नमन मंच-महाराष्ट्र कलम की सुगंध
तिथि-04/10/2020
विषय-पर्वत/पहाड़

मैं हूँ पर्वत
********

मैं पर्वत,गिरि,पहाड़,,,,देश का हूँ  मैं प्रहरी,
देखो मुझ पर है हिम पड़ती है धूप सुनहरी।
मुझसे निकलती हैं कलकल करती नदियाँ,
झर-झर झरती बहती ढुलकती जाये निर्झरणी।

मैं हूँ हिम से आच्छादित बन गया मैं हिमाचल,
पूरब में करता स्वागत अरुण का,बना अरुणाचल।
मुझ पर ही है प्रदेश सियाचिन,कारगिल,
बनो तुम वीर प्रखर, तू बढ़ते चला चल।

मैं अडिग,अचल,,,खड़ा तपोवन में तपस्वी सा,
तुम भी अपने जीवन में बनो अडोल मुझ सा।
न दिगो अपने पथ से, बने रहो अपने पथ पर,
अपनी प्रतिज्ञा से न डिगो कभी चलते रहो अपने पथ पर।


स्वरचित
अनिता निधि
जमशेदपुर,झारखंड
2️⃣

प्रकृति नटी,
चोका कविता, जापानी विधा,-
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महाराष्ट्र कलम की सुगंध
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संग रहती,
मनुज सहचरी,
प्रकृति बन,
गाकर सुलाती है
गीत लोरियां,
नित नित लुभाती,
मन तरंगों,
चिर प्रकृति नटी,
हँसरहे है
गिरि पर्वत तरु,
मूक आनंद
लहलहाती खेती,
झूमे फसलें,
हँस रही खेतियाँ
प्राण हर्षित
भीनी नशा छा रहा,
गीत संगीत,
पुरव ईयाँ गाऐ
मेघ बजाए,
धरा गिरि ,गगन
चंप ई ज्योत
सारी प्रकृति पर,
पसरा हुआ,
प्रकृति श्वेत परी,
गिरि शिखर
श्वेत चादर ओढ़े,
देव दूत सा खड़ा।।
चोका कार देवेन्द्र नारायण दास बसना, ग,4/10/2020/

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महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित विषय आधारित लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

Thursday, October 1, 2020

आग/अग्नि

प्रथम स्थान
नमन मंच
महाराष्ट्र क़लम की सुगंध
विषय ..आग / अग्नि
01-10-20 गुरुवार

अग्नि कई प्रकार की ,
   होती हैं इस संसार ।
      घर अग्नि दावानल अग्नि,
          पेट भूख की आग ।
सबसे बदतर अग्नि हैं वो ,
   जीवन में आग लगाये ।
     अंतर्मन की अग्नि को बोलो ,
        कैसे कोई बुझाये?
अंतर्मन में आग लगे ,
   मानव अंधा हो जाता ।
     जैसी गति अब देख रहे हो,
         जग कैसा झुलसाया। 
कब तक अगन ये बलात्कार की ,
 जग में जलन करेगी ? 
   कौन सा नीर बहायें इसमें,
      जिससे ये आग बुझेगी ?
कौन सी चिंगारी दानव में ,
  उठती जो ये आग लगाता ।
      क्यों भूला वो जो तू आज है़,
         ऐसी युवती ने उपजाया ।
उसी युवति की मर्यादा तू ,
   आज भंग है़ करता।
     क्यों नहीं शर्म जरा खाता,
        पानी में डूब तू मरता ।
बंद करो इन व्यभिचारों को ,
  इतना देख रहे हो ।
     इससे ज्यादा पाप की हालत ,
         क्या तुम अब चाहते हो ?

स्वरचित सुधा चतुर्वेदी मधुर 
                  मुंबई
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द्वितीय स्थान
नमन मंच
विषय-आग
दिनांक-1/10/20
विधा-छंदमुक्त

व्यथिति ह्रदय से
धधक रही
अन्तर्मन की ज्वालायें
आखिर कब तक
मिटती रहेगी
घर आँगन की अबलाएं
चारो तरफ मची हुई
बेटियों पर यातनाएं
अश्क भरे नयनो से ताके
बतला दो मुझको सारे
शीर्ण काया
छिन्न भिन्न अंगस्थल
निस्तेज नयन निहारे
अभी अभी तो हुई सुबह थी
तिमिर प्रभा क्यों आई
आखिर कब तक
सहती रहेगी
ओ माँ तेरी बिटिया रानी
नही कोई अपराध मेरा
फिर भी चेहरा मेरा काला
जीकर भी मरते रहेंगे
पीना होगा
विषपान मेरा
हाथ जोड़कर
विनती करती
एक माँ बाबा की प्यारी परी
साहस अगर
तुममे हो मानव
तो इतना कल्याण करो
नारे बाजी ,प्रदर्शनऔर
श्रंद्धाजलि ये
सारे अपवाद बंद करो
मेरी तरह इन दरिंदो को
तिल तिल कर
मरने को मजबूर करो
फांसी ही अंत है इनका
दर्द इनको भी सहने दो
तड़फ तड़फ कर
मौत माँगने को इनको मजबूर करो
नही जानते
फाँसी पाकर
एक एक साँस की कठिनाई
कैसे हमने मौत पाई
कितने सपने हमने सजोये
जो थे बरसो से जोए
इतना खौफ भर दो इनमे भी
भूल जाये
बेटा बनकर जीना....

स्वरचित
मीना तिवारी
पुणे महाराष्ट्र
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तृतीय स्थान
मंच को नमन
विषय :आग/अग्नी
दिनांक१-१०-२०२०

हे आग अग्नि तेरे अनेक
अनेक स्वरूप
और अनगिनत अलग कई रंग रूप!!

मंदिर का दीपक आरती की लौ
अगरबती से निकले
धूएं को कहते है धूप!!

आग की आंच अनुपात में हो
तो अव्यय को आयाम और आकार ये देती
अतिरेक हो तो करती भष्मिभूत!!

चूल्हे में खुद जल कर खाना पकाती
जंगल में जले तो दावा नल
कहलाती
सौम्य यज्ञ होम हवन दैविक प्रारूप!!

कल कारखानों
और भट्ठी की आग में तपती तपाती
चूने से लेकर सोना
लोहे से लेकर कांच कथिर पिघलाती

अदृश्य ऐसी क्रोध रोष आक्रोश की आग भी कम नही
धधकती तो सीने में पर
जलती जलाती ज्वाला करती हुई तहस नहस गुजरती
उसका भी रहता एक अलग प्रकार खौफ!!

देश भक्ति की आग भी आग है
जो निश्च्छल  होकर मंद मंद जलती
मर मिट जाने तक और सरफरोशी की तमन्ना लिए बे रोक!!

अचानक लगी हादसों की आग कुपित 
हुई अगर
लाशें ढल जाती कई
बढ गया अगर कोप प्रकोप!!

एक आग जो शमशान में लाशों को भी जलाती!!
खुद जलकर होती न्यौछावर लेकर भाव निर्लेप निर्लोभ !!

अशोक दोशी
सिकन्दराबाद
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सराहनीय प्रस्तुति
1️⃣
नमनमंच संचालक ।
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध।
विषय - आग/ अग्नि
विधा - मुक्तक
स्वरचित

आग जल रही है जोशे-उमंग,दिल में संभाल कर रखिये।
रखना है अपना बजूद जिंदा,स्वाभिमान बचा कर रखिये।
बुझ गयी लौ संघर्षों की धूप से,तो फिर रह जायेगा क्या
ताप सहने की कुब्बत जद्दोजहद में सहज बचा कर रखिये।।
****

प्रीति शर्मा "पूर्णिमा"
01/10/2020
2️⃣
महराष्ट्र की कलम की सुगंध आदरणीया अनुराधानरेन्द्र चौहान जी एडमिन विषय आगहै।।
गजल ----
झूठ को सीने से हम लगा बैठे है,
सच के जलते दीये हम बुझा बैठे है।।1।।
भू पर अमीर गरीब जातियाँ दो है,
फासलें क्यो दिलों में हम बना बैठे है।।2।।
मानवता की बगिया में तुम देखो,
नेता कौमी आग को जला बैठै है।ः3।।
हिंसा घृणा,के बीज हम ही बोते रहे है,
सत्य निष्ठा,प्रेम, को हम जला बैठे है।।4।।
जनसेवक कहाँ है झूठों वादों से,
देश के नेता हमे बहला बैठे है।।
स्वरचित दैवेन्द्रनारायण दासबसना छ,ग,।।
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महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित विषय आधारित लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र गूगल से साभार

पिता

  प्रथम स्थान नमन महाराष्ट्र क़लम की सुगंध मंच दिनांक - १६/१०/२०२० दिन - शुक्रवार विषय - पिता --------------------------------------------- ...