Tuesday, September 22, 2020

हरियाली

प्रथम स्थान
स्वरचित
कोरोना ने बहुत कुछ छीन लिया है पर बहुत कुछ दिया भी है। कहीं चिंता दी तो कहीं चिन्तन। किसी का चैन छीना तो किसी को सुकून दिया। लेकिन हम बात करेंगे सकारात्मक पहलू की।

खुशियाली है... हरियाली है...
देखो हर तरफ प्रकृति में
छाई हरी हरियाली है।
घर में भी देखो अब तो
आई खुश खुशियाली है।।

बाग बगीचे सब हरे -भरे,
वृक्ष फूलों-फलों से लदे फदे।
चिकने हरे हरे से पत्ते,
चमके मानो रुधिर भरे।।

लगते कितने खुश हैं ये
स्वच्छ हवा में लेते श्वांस।
जीवन में कब देखे ऐसे
सुमनों पर भरपूर पराग।।

है प्रदूषण से मुक्त धरा ।
साफ सुथरा है पर्यावरण।
सौन्दर्य से भरपूर निखरा-निखरा
प्रकृति का है कण-कण।।

साफ बह रहीं नदियां
सबकी जीवनदायिनी।
होगी अब भरपूर फसल
पौष्टिक आरोग्यबर्धनी।।

देखो कितनी हरियाली।
छाई कितनी हरियाली।।

जीवन में भर गये फिर रंग
घर घर हंसी ठहाके गूंज रहे।
दादा-दादी,मम्मी-पापा के संग
मस्ती,नोक-झोंक भरपूर रहे।।

प्यार पुरसुकून मन में फिर
फिर उमंग,तरुनाई भर आई।
घर लगते पावन मन्दिर से
रौनकें बहु-बेटीं लेकर आईं।।

मतभेद विचार कुछ ढह रहे
समन्वय के संस्कार बह रहे।
लहरा रहा भारतीय संस्कृति का परचम
हो रहा फिर नये पुराने का संगम।।

ऐसा मौका मिलेगा ना फिर
जी लो जीवन के ये अद्भुत दिन।
स्मृतियों में बस जायेगें
कोरोना वाले दिन कहलायेगें।।

देखो खुशियाली आई।
घर में खुशहाली छाई।।
***

प्रीति शर्मा"पूर्णिमा"
21/09/2020
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द्वितीय स्थान
विषय .......हरियाली

हरियाली ये मनभावन है,
    धरा ने चूनर ओढ़ी है।
      हरी  भरी ये धरती लगती ,
        अब शांति आभूषण शोभित है।

प्रदूषण से राहत लगती ,
    तव ही  वसुंधरा सजी हुई ।
       हरियाली चहुँ और है फैली, 
          पर लम्बी सांसो में सिसक रही।

धुंधली यादों के साये में ,
    नित मुझको दीखे वो मोड़ ।
        वो  हरियाली रास्ते जिस पर ,
             आती सड़क थीं  चारों ओर ।
       
हरियाली  बिन रस्ता नहीं सजती,
   चौराहे की शान सजे ।
         तुम मिलते थे में मिलती थी ,
              पर आज वहाँ विश्राम लगे ।
       
कहां गयीं वो सड़क की रौनक ,
    जिस पर मेले लगते थे ।
       पहचान नहीं  होती अब उसकी, 
         जिस मोड़ पर हम सब मिलते थे
               
सड़कें अब वीरानी रहतीं ,
      हरियाली बिन  घबराती हैं। 
           क्या मोड़ों पर पड़ी आपदा, 
               बिल्कुल चैन न  पाती हैं।
           
सुन्दर वादी हमसे पूछें ,
    तुम सब कहां पर खोये हो ।
        क्यों नहीँ मिलने मुझसे आते ,
             किस विपदा से रोये  हो ?
     
पता नहीं अब कब रस्तों पर ,
    जन मानस की भीड़ लगे ।
       वाहन अब कब  दौड़ लगायें ,
           मधुर आस में सभी पड़े।
       
         स्वरचित     सुधा चतुर्वेदी मधुर
                         मुंबई
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तृतीय स्थान
वो खड़ी
दूर मुस्करा रही थी।
शायद मेरा
उपहास उड़ा रही थी।
सच क्या
मैं शायद जानती थी।
बड़ी बारीकियों से
मेरे उफनते जज्बातो को
पहचान रही थी।
सच मे वो मेरा मजाक उड़ा रही थी।
मैं गुमसुम सी उसको ताक रही थी।
जानती थी।
तभी तो हवाओ के
एहसासों से
मुझ को संदेशे भिजवा रही थी।
मानो कह रही
क्यो बैठी हो
छिपकर
आओ न मिल बैठ
करती हूं कुछ बाते
कुछ बीती अधूरी पूरी बातें
पहले की तरह
करो न मेरा स्पर्श
दो न सुखद एहसास
जोड़ दो साँसों के तार से
अपने नर्म पैरो
के तलुवों से सहला दो मुझे
अपने होने का एहसास दिला दो
बहुत हो गया
खामोशियो का गुजरता सफर
पर सुनो न
पर मत वापस देना
वो प्रदूषण
जहर मिला।
कितनी काली हो गई थी।
मत दोहराना
न मिटाना
मेरा अस्तित्व
कितनी सुन्दर हो गई मैं
वापस हरी भरी
स्वच्छ हरियाली युक्त
झूमती मैं पवन संग
मत करना मेरा उपहास
किस तरह
छिपकर बैठी हो
झांक रही हो
शाश्नकित तन मन से
आओ न तुम भी
लो न सुखद एहसास
मेरे संग का
मैं भर लूँगी तुमको
अपनी आगोश में
झूम उठेगा मेरा आँगन
नन्हे मुन्नों की किलकारियों से
पर मत आना
बीते इतिहास को दोहराने
मेरे जज्बातो का
उपहास उड़ाने.....

स्वरचित
मीना तिवारी
पुणे महाराष्ट्र
🥀🥀तृतीय स्थान🥀🥀
 - - - - -
        * सुरमयी प्रकृति *
                  *
बादलों के टंकार गर्जन नाद से
          धरती,मुस्कुराई।
पपिहे की पीउ कहाँss रुदन
       स्वर,फिर करुणआई।
रिमझिमबूदों ने वर्षाकर, धरती
        की प्यास बुझाई।
अनुपम हरियाली सर्वत्र धरणी
        पर,चहुं-दिश छाई।
हुई प्रकृति रमणीक, वसुंधरा
       मुखरित हो हरसाई।

प्रकृति है ममतालु वात्सल्यता
     लिए,आँचल रही फैला।
आह!मधुर संगीत सुरों में मगन
          पंक्षी रहें हैं गा।
फल-फूल खिल उठे क्यारी-क्यारी,   
         कलियन रहीं मुस्कुरा।
ललक-पुलक-थिरक रहे पंक्षी,
       गुटुरगूँ कर रहे बतिया।

काले-काले मेघ छा रहे,दामिनी
          घनबीच अपार।
सर-सरिता-गिरि-तरुवर सबके
       मन में है, अह्ललाद।
फल-फूलों से लदे वन उपवन
     हृदय तंत्र में,उल्लास।

हरियाली चूनर ओढ़े भू ,पर्वत
     का जूडा लिया बना।
रंग बिरंगे रत्न आभूषण कुंदन
     प्रकृति तन में जड़ा।
 सिंधूरी लाली सूरज धरणी मांथे
        का,टीका बना।
इत्रमें भींनी-भींनी मलयज, सांसों
        में सर्वत्र घुल रहा।
           * * *
*"नीलम पटेल" *प्रयागराज *
(स्वरचित,मौलिक, अप्रकाशित रचना)
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀
सराहनीय प्रस्तुति
नमन मंच
आँखों को तृप्ति देती है मन को हर्षाती है हरियाली,
चहक रहा उपवन सारा चारों ओर छाई हरियाली,
नाचे मयूर और बोले पपीहा मेंढ़क टर्र-टर्र करते,
सूरज जब भी निकलता नभ में निखरे उसकी लाली!!

खेतों में फसलें लहराएं सरसों पीली दिल को लुभाएं,
लहलहते फसलों को देखकर किसान उत्सव मनाएं,
सुन्दरता वसुधा पर छाई जब घिर आई काली घटाएँ,
सारे पक्षी शोर मचाते गीत गाती है कोयल काली!!

आओ जगह- जगह पर  अपनी पसंद के पेड़ और फल लगाएं,
प्रकृति की इस अद्धभूत देन से नाता जोड़ें और सबका जीवन सफल बनाएं!!

आभा सिंह
लखनऊ उत्तर प्रदेश 
मेरी रचना मौलिक, स्वरचित है।
___________________
सराहनीय प्रस्तुति
महाराष्ट्र कलम की सुगंध
21 सितंबर 2020
विधा-क्षणिकाएं
************************   
     1.
हुई सुबह मन इठलाए,
काले काले बादल छाएं,
मन में उमंग जब भरता,
हरियाली मन को लुभाएं।
       2
चहुं ओर फूल खिले हो,
जहां बैठकर मन हर्षाये,
हरियाली के नाम पर ही,
खुशियां दामन भर जाए।
     3
मन मुदित हो देख छटा,
आसमान पर छाए घटा,
रिमझिम बारिश होती है,
हरियाली की झुकी लता।
************************
स्वरचित, नितांत मौलिक
*******************
*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
 व्हाट्सअप एवं फोन 09416348400
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀
महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)
चित्र गूगल से साभार

Sunday, September 20, 2020

आँखें

प्रथम स्थान
--------------
दिखाई देती है उसमें,
अंतर मन की सभी दशा,
नयन तो दर्पण है ,
मन का।

देख पाते है, इन नयनो से हम,
निकृष्ट और उत्कृष्ट
में अंतर,
देखते है हम नयन से,
जगत की मंजुलता।
हृदय का संदेश वाहक है नयन,
देख पाते हम उससे,
जीवन के अयन।
अम्बक से ही किसी
को देख कर प्रशन्नचित,
हम होते हैं हर्षित।
दया की भावना भी हृदय में, नयनो से
आती है।
बात हो निस्वार्थ प्रेम की या हो निच्छल स्नेह की,
चित्त को ये बोध तो,
नयन हीं कराते है।
हृदय के साथ होता है,
नयन का रिश्ता इतना
गहरा,
रुदन को करता है हृदय पर अश्रु तो,
नयनों में आतें है।
बड़ा हीं महत्वपूर्ण है,
तनु के लिए नयन।
जिसे न दिखे नयन से,
उनके लिए अश्रुपूरित,
होता है हर क्षण।
हम मानस में रखे ये ज्ञान सदा,
सदैव ध्यान रहे अनमोल नयन का।

दिखाई देती है उसमें,
अन्तरमन की सभी दशा,
नयन तो दर्पण है मन का।।

- मिनाक्षी जायसवाल
   पदमा ( हजारीबाग)
     झारखंड
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द्वितीय स्थान
----------------
         *प्रतिबिम्ब *
आँखें मन का दर्पण,मन को
       मुखरित करतीं।
भृकुटि-भंगिमा चेहरे की मन
       का भाव,दर्शातीं।
जो भी देखा करतीं,उसेआँखें
         कैद कर लेतीं।
नयनअवरुद्ध हृदय की बंधन
        व्यथायें कहतीं।
जो हम न कह पाते,आँखें सब
        कुछ ब्यान कहतीं।
मन के सारे भेद येआँखें बखूबी
             खोल देतीं।
सत्य-झूठ,बुरे-भले सारे कर्मों का,
        अवलोकन करतीं।
संध्या की लाली समान जब आँखें,
      थक कर सोतीं।
अंतर्व्थाएं काफी हद तक मन
       हल्का कर देतीं।
दुख में आँखें मेंघ बन रिमझिम
        अश्रु छलकातीं।
आँखेंजाने कितनी ही उपमाओं
        से उपाधि जातीं।
कोई कहताआँखें हिरणी जैसी
      मतवाली है प्यारी ।
शायरों द्वारा सुंदरआँखों की महिमा
         बखानी जाती।
           *   *    *
*"नीलम पटेल"*प्रयागराज *
(स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित
रचना)
🌷द्वितीय स्थान🌷
नमन मंच
विषय-आँखे


मन का आईना बन
चंचल शोखियो सी
गहरी झील सी
गहरी ये आंखे
बहुत कुछ कह जाती ये आँखे

दिल की नगरी में रह
कहती जज्बातो की कहानी
या करती कोई नादानी
मुस्कराकर जता जाती
ये खूब सूरत सी आँखे

नचाया करती है
ये नाचने वाली
इशारो ही इशारो में
बया कर जाती
सारे दिले हालात
सच मे क्या क्या कह जाती आंखे

कभी सुर्ख गुलाबी सी
सागर की आगोश में
परछाई दिखाती हुई
बन रवि की छाया
अंगारे सी धधकती
जलती और जला जाती ये आंखे

पल्लू को ओठो से दबा
झुकी पलको को से
तिरछी आँखों से
दिल की बातो को
बिन कहे कह जाती
ये शर्माती सी आँखे

कभी लाल कभी नीली
कभी पीली कभी गीली
कभी ओस की बूंदे टपकाती
कभी दुखो को
बया करती
और कभी जार जार रो कर
दिल की तड़फ बतला जाती ये आंखे

छिपे है ढेरो राज
बन नैनो का साज
बड़ी तमाशबीन है
बेपनाह हुनरमंद
दिल की वसीयत
बड़ी रंगीन है ये आंखे
सच मे क्या क्या गुल खिला जाती ये आंखे

स्वरचित
मीना तिवारी
पुणे महाराष्ट्र
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तृतीय स्थान
-------------
#आंखें
******
ना जाने कितनी उम्मीद से
तकती हैं तुम्हें ये मेरी निगाहें
हर बार लौट आती हैं निरूत्तर
ये बोलती आँखें!

है इन्तज़ार भरा भाव कितना
मेरी इन निगाहों में
पूरा होता नहीं है सपना
तकती रहती हैं आँखें!

शायद निगाहों ने निगाहों की
भाषा पढ़ी नहीं,समझी नहीं
पाया ना उत्तर
है प्रतीक्षारत आँखें!

उतारा है क्या अपनी निगाहों से
खोजता हल मेरा अन्तर्मन
मिलता नहीं है हल
अनुत्तरित हैं आँखें!

मैं नहीं चाहती गिरो तुम,मेरी निगाहों से
बसे रहो मेरी इन निगाहों में
दर्शन करती रहूँ मैं तेरी
आनंदित होती रहें मेरी आँखें!

स्वरचित
अनिता निधि
जमशेदपुर,झारखंड
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सराहनीय प्रस्तुति
(1)
आँखें  न  केवल  चेहरे  की  सुंदरता ,
नजरों की दृष्टी की आँखें ही माध्य हैं ।
नजरों का  साधन बनती ये  आँखें हैं ,
आँखें ही नजरों की साधन और साध्य हैं ।

आँखें बदलती हैं बार बार नजरों को ,
कभी रौद्र दीखें कभी प्यार की कटार हैं ।
नजरों में गिरता जो बार बार आँखों से ,
फिर  न  उठे चाहे  कोशिशें हजार   हैं ।

आँखें मिलाना पर आँख न चुराना कभी ,
ये ही दोस्ती और रिश्ता निभाती हैं ।
आँख के इशारे पर नजरें हैं चलती सदा, 
नजरें छिपायो लाख आँख सब बताती हैं ।

आँखों और नजरों की दोस्ती है प्यारी सी ,
जहां नजर उठे वहाँ आँख घूम जाती हैं ।
आसपास दुनियाँ में ' मधुर' हमारे  क्या ,
नजरें सब लाती खबर आँख को बताती हैं ।

स्वरचित मौलिक ...सुधा चतुर्वेदी' मधुर

                           मुंबई
(2)
विषय - आँखें
विधा -कविता

हर बार ये करामात दिखाती हैं आँखें,
कितने भी गहरे राज हों बोलती हैं आँखें,
ये तो इन्सान के दिल का आईना होती हैं,
खुशी के आँसुओं को भी अपने आँचल में
पनाह देती हैं आँखे!!

कभी गीत कोई तो कभी गज़ल हैं आँखें,
कभी कोई चेहरा झील जैसा तो कमल हैं आँखें,
जादू की पुड़िया होती हैं आँखें,
कभी गम में कभी खुशी में रोती हैं आँखें!!

सारी दुनिया के राज खोलती हैं आँखें,
लोगों से ज्यादा बोलती हैं आँखें,
ईश्वर का सबसे सुंदर उपहार हैं आँखें,
नमन उस प्रभु को जिसने हमें दी है ये
प्यारी आँखें!!

मौलिक- आभा सिंह
लखनऊ उत्तर प्रदेश
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महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
चित्र गूगल से साभार
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

Saturday, September 19, 2020

बचपन

🌷प्रथम स्थान 🌷
महक उठा
देखो प्यारा बचपन
हमजोली का न्यारा बचपन
बहुत दिनों से झाँक
रहा था
झरोखे से कांख रहा था
दोस्त सारे गुम हुए
न जाने कहाँ गए
कितनी बाते तुम्हे बतानी
जो हमने जेल में काटी
सब रहते छुप छुप के
बात बात पर हाथ धुलाते
शंकाओ की बांध पोटली
खुद जीते और हमे जिलाते
सारा दिन मोबाइल लेपटॉप
ऑफिस का घर पर काम
हर बात पर मिलती डॉट
सारा दिन खड़ी होती खाट
दादी दादा रहते चुप चाप
सुननी पड़ती इनकी भी बात
पार्क स्कूल हो गए बन्द
हम भी हुए है नजरबंद
क्या तेरे संग होती ये बात
नही मिलता तुझको साथ
भूल रहे हम सारे खेल
मिली जब से घर की जेल
छूट गया यारो का मेल
दौड़ धूप
की प्यारी मस्ती
अपनी भी थी कोई हस्ती
कोई लौटा दे बीते दिन
हँसी खुशी के बीते दिन
जाओ अब तो
कोरोना भाई
कैसी ये आफत दिलवाई
मुक्ति करो हमको जीने दो
यारो से यारी करने दो
हंस कर कुछ बाते करने दो
नीना यू ही मिलती रहना
चुपके से पर आती रहना
बोझ दिलो का हल्का होगा
पता नही कब तक
जीना होगा
घर पर ढेरो चौकीदार
होती रहती जांचपड़ताल
रखना पड़ता
सबका खयाल
पर मिलेगे हम चुपचाप
आखिर बचपन का हमारा साथ

स्वरचित
मीणा तिवारी
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🌷 द्वितीय स्थान 🌷
क्या कहा?
बचपन...
वो तो चला गया...!!
कहां गया बचपन...?
खो गया...क्या....??
आधुनिक जीवन की
आपाधापी में,
पढ़ाई के बोझ में,
मां पिता की व्यस्तताओं में,
एकल होते परिवारों की मजबूरी में,
या इलैक्ट्रोनिक मीडिया के प्रचलन में..???

ना...ना...ना...
बैठा है दिल के
किसी छोटे कोने में
समय के इन्त़जार में।
जैसे ही मिलता है मौका
फटाक से निकल आता है।
उम्र चाहे गुजर चुकी बचपन की
हो गये हों चाहे अब हम पचपन के।

आज भी हंस लेते हैं
वक्त-बेवक्त खिल-खिलाकर
ठठाकर,तालियांमार या शर्माकर।
कर देते छोटी-छोटी गलतियां
या हऱकतें,बालकों जैसी
और खुद ही डांट लेते हैं
प्यार से खुद को।।

जी लेते हैं
समय-समय बचपन
बच्चों के साथ।
पुराने दोस्तो से मुलाकात,
आंखों में तैर जाता
अद्भूत उल्लास।
और ज़िंदगी भर जाती
फिर जिंदादिली से,
जिंदगी से एकबार।।
***

प्रीति शर्मा" पूर्णिमा"
18/09/2020
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🌷 तृतीय स्थान 🌷
बचपन कैसा प्यारा होता ,
    हमजोली की टोली ।
तरह तरह के खेल है इसमें ,
   नित नई हँसी ठिठोली ।

कहीं भी बैठो कहीं भी घूमो ,
   बंदिश नहीं कोई होती॥
घर   घर की सब  बातें होतीं ,
   कोई बात रहस्य न होती।

कंधे पर भारी बस्ता लटके ,
   हाथ में बोतल पानी ।
वजन   उठाते बड़े  प्रेम से ,
    दोस्ती होती दीवानी ।

हम गुड़िया बचपन में खेले,
   ढोलक साज सजाते थे ।
घर से ला सामान खाद्य का ,
     हम बारात बुलाते थे ।

पर आज न जानें खेल खिलौना ,
     बच्चे व्यस्त पढ़ाई से ।
उनका बचपन मधुर छिन गया ,
       कम्पूटर मोबाइल से ।

  ऑन लाईन हो रही पढ़ाई ,
बचपन परिपक्व है रूप बना ।
   नहीं जानते बचपन बच्चे ,
 बचपन तो इनसे छिन ही गया ।

स्वरचित अप्रकाशित रचना   
सुधा चतुर्वेदी मधुर
   .    .मुंबई
मोबाइल .....9833438261
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सराहनीय प्रस्तुति
(१)
लौटा दे कोई वो प्यारा बचपन..........

हांलाकि अब तो मेरे पार हो गये पचपन
पर नहीं भूला वो मेरा प्यारा आज भी मैं बचपन!!!

स्वछंद पर संतोष और कंचन मन
अहंकार का तो
नामो निशान नही
न तोहमत न आक्षेप न लांछन!!

अगर किसी मित्र से कुट्टी हो भी जाती
तो वो मिट्टी के खेल में  हो जाती थी
धूमिल अब मत पुछना
वो कब कैसे और क्यों ?आज  तक नहीं जान पाया
वो जो कच्चे घडे सा था मन !!!

मां का लालन पिताजी का पालन
महफूज रखता था हमें
दादाजी बडें गहन समझदार थे
मेरे "ऐ" वन!!

रात में  तिन बार उठते थे मेरे  ओढ़ने
बिछौने का निरीक्षण करने
कहीं खुला न रह जाये मेरा तन !!!

शहर में तो हम बहुत बाद में आये
मेरे वतन की गलियों व आधा हमारे
खेत खलियान में बीता था
वो प्यारा सा बचपन!!!

बहुरूपीयों का खेल
रामलीला और लोक गीत व नाटक का मंचन
देखते देखते बडे  हुऐ न अवरोध न अडचन!!!

हांलाकि अब तो मेरे पार हो गये पचपन
पर नहीं भूला वो मेरा प्यारा अभी भी
मैं बचपन!!!

काश! लौटादे  कोई मेरा निःश्चल मन
मां का आंचल पिताजी का दुलार
दादाजी का प्यार
और वह प्यारा सा बचपन!!

स्वःरचीत :अशोक दोशी
सिकन्दराबाद
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(२)
"बचपन"
जीवन में महकती है जिसकी खुशबू
और हर पल याद आता है जो
सबसे बेपरवाह होकर
तितलियों के पीछे दौड़ना
जुगनुओं को पकड़ कर
मुठ्ठियों में बंद करना
बारिश के पानी में
कागज की नाव चलाना
कुछ सिक्कों के लिए
जमीन पर लौट कर
जिद अपनी मनाना
विद्यालय न जाने के
नये नये बहाने बनाना
छोटी छोटी बातों पर
दोस्तों से झगड़ना
थोड़ी देर गुस्सा
फिर साथ खेलना
एक दौर जीवन का
जिसमें चाहता हूँ
एक बार फिर लौटना
वो बचपन की मस्ती
और बेफिक्र होकर
यहाँ वहाँ घूमना
चाहता हूँ एक बार फिर
वो बचपन मैं जीना
वहाँ लौटकर फिर से
वो खुबसूरत दिन जीना
जीवन में सबसे खूबसूरत
और खुशनुमा बचपन का होना
यही ख्वाहिश है मेरी
फिर बनकर बच्चा
बचपन को फिर से जीना
©®धीरज कुमार शुक्ला "दर्श"
ग्राम व पोस्ट पिपलाज, तह. खानपुर
जिला झालावाड़ ,राजस्थान 326038
दूरभाष अंक-7688823730
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(३)
शीर्षक- खिलखिलाता बचपन मेरा

खिलखिलाता बचपन मेरा, खिलखिलाते बच्चे।
स्कूल को जाते हम सब मिलकर, दिन थे कितने अच्छे।।

अठन्नी चवन्नी बहुत थी, तब आते दोने भरके।
इंटरवल में चीजें खाते, लाते घर से सिक्के।।

हिंदी साइंस तो अच्छे लगते ,रहे गणित से बचते।
क्रोध में तो टीचर रहते ,धरते घूसे मुक्के।।

इंटरवल का पीरियड छोटा ,खेले कब हम बच्चे।
पढ़ाई में तो आगे बढ़ गए, रहे खेल में कच्चे।।

स्कूलों में ही मित्र मिल गए, बिन विज्ञापन खर्चे।
पाकर इनको धन्य हो गए, जैसे हीरे पन्ने।।

गुरु ज्ञान से नेक बने हम, कर रहे सेवा हृदय से सच्चे।
इंजीनियर डॉक्टर कुछ वैज्ञानिक बन गए ,इरादे थे जिन जिनके पक्के।।

स्कूल से ही नैतिकता पा गए, हर कृत्य राष्ट्र को समर्पित करते।
एक दिन भारत विकसित होगा, रह जाएंगे सब हक्के बक्के।।

विश्व गुरु बनेगा भारत , होंगे कई चंद्रयान अंबर पे।
अलग ग्रह पर होंगी रस्में, अलग ग्रह पर नाते रिश्ते।।

खिलखिलाता बचपन मेरा, खिलखिलाते बच्चे।
स्कूल को जाते हम सब मिलकर, दिन थे कितने अच्छे।।


✍डा.शुभ्रा वार्ष्णेय
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महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र गूगल से साभार

Friday, September 18, 2020

चित्र लेखन

प्रथम स्थान
नमन मंच
महाराष्ट्र क़लम के सुगंध
विषय .....चित्र लेखन
17-09-200
प्रकृति क़ी गोद

रे मानव ! ये तेरी भूल है ,
प्रकृति से क़ी खिलवाड़ है ।
उसके बिन तेरी गति नहीं है ,
ना मानव  तेरा वंश आधार है ।

सांस क़ी गति मुझ से ही है ,
स्वच्छ वायु क़ी में आधार ।
ईश्वर क़ी प्रिय वरदान हूं में ,
जीवन तेरा मुझसे साकार ।

फल फूल क़ी उत्पत्ति मुझसे ,
कली कली में खिली खिली ।
में   बच्चों को गोद  में रखती ,
मेरी वंश बेल मिटा क्यों   दी ।

मुझ मिट्टी में बच्चे खेले कूदे ,
खेल कूद कर बढ़े हुए  ।
उसी धरा का छेदन करके ,
चीड़ फाड़ तुम खुशी हुए ।

फूलों से कोमल बच्चों सम ,
तुमने है चमन उजाड़ दिये ।
कभी ना सोचा पुष्प पल्लवित ,
वृक्षों को तुमने काट दिये ।

वृक्ष के बिन क्या फल मिल जायें ,
अन्न के कण कण तरसोगे ।
सूर्य देव के ताप से बचते ,
अब तुम  शीतल को तरसोगे ।

स्वरचित    सुधा चतुर्वेदी मधुर
                    मुंबई
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
द्वितीय स्थान
नमनमंच संचालक ।
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध।
विषय - चित्रलेखन ।
विधा -छन्द मुक्त
शीर्षक - मैं तो तेरी मां हूं और साथ हूं बाप भी।
स्वरचित।

मैं तो तेरी मां हूं और साथ हूं बाप भी।
कर्तव्य निभाएं मैंने,परम पिता की छवि।।

कैसे तू भूला मानव? मैं हूं तेरी प्रकृति।
ईश्वर का वरदान,उसकी अनुपम कृति।

तेरी रक्षा करती हूं मैं।
हरदम रत रहती हूँ मैं।
मां की तरह मैंने तुझे
आंचल की छांव दी।
और पिता की तरह मैंने
तेरी क्षुधा शांत की।।

मैं तो तेरी मां हूं और साथ हूं बाप भी।
कर्तव्य निभाएं मैंने, परमपिता की छवि।

कैसे भूला तू मानव? मैं हूं तेरी प्रकृति।
ईश्वर का वरदान, उसकी अनुपम कृति।।

मेरे हर अंग का तूने
खूब इस्तेमाल किया।
चाहे जड़ हो या तना?
सबने है कमाल किया।

पत्ती-पत्ती,कलियां-कलियां
सब काम तेरे आए।
कोई बना रोग की दवाई
कोई चेहरा संवार जाए।

मैं तो तेरी मां हूं और साथ हूं बाप भी।
कर्तव्य निभाएं मैंने, परमपिता की छवि।

कैसे भूला तू मानव? मैं हूं तेरी प्रकृति।
ईश्वर का वरदान, उसकी अनुपम कृति।।

हर सांस को सांस का हक,
हर प्राणी को आस।
वातावरण को शुद्ध पवित्र,
दिया सबको वरदान सायास।।

हर कण-कण से अपने
पृथ्वी को उर्वरा खूब किया।
ना काटो मुझे वरना, मानो
रोगों से संग्राम हुआ।।

मैं तो तेरी मां हूं और साथ हूं बाप भी।
कर्तव्य निभाये मैंने, परमपिता की छवि।

कैसे भूला तू मानव? मैं हूं तेरी प्रकृति।
ईश्वर का वरदान,उसकी अनुपम कृति।।
*****

प्रीति शर्मा," पूर्णिमा"
17/09/2020
______________
🌷द्वितीय स्थान🌷
_______________
नमन मंच
विषय - चित्र लेखन


बरसती बारिश,
समंदर, समंदर की लहरें,
घने बादल,
ढलता सूरज,
कितना कुछ है प्रकृति में
मगर मानव करता विध्वंस है

बेबाक पंछीओं उडना,
कड़कती बिजली,
रातों की शान्ति,
खेत खलियानों की हरयाली,
कितना कुछ है प्रकृति में
मानव देता बड़ा दंश है!!

तपता गगन,प्यासा उपवन,
लू के झोंके, भरा दौंगरा,
जूही की कली पल यौवन भरा,
मृदु मुस्कान, कोयल की तान
कितना कुछ है प्रकृति में
मानव भी इसका अंश है!!

जेष्ठ की तपन, आषाढ़ का गर्जन
गाते मेंढक, विकल जन जन
फिर खुले आसमान,
हर्षित किसान
कितना कुछ है प्रकृति में
प्रत्येक जीव इसी का अंश है!!

@मौलिक अप्रकाशित

स्वरचित ----- -    अभिषेक मिश्रा
बहराइच उत्तर प्रदेश
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
तृतीय स्थान
नमन मंच
विषय चित्र लेखन

तू देख रहा
रे मानव
यौवन प्रकृति का
खिला खिला
जब से तू
रहा छिपा छिपा
प्रदूषण मुक्त
हो गई धरा
सज गई धरा
पहन धानी चुनर
चहके पक्षी
डाल डाल फिर पात पात
जो धुले धुले
निखरे लाजवाब
दे रही प्रकृति
सुंदर दावत
आलिंगन स्नेह संचार
किलकार रही धरा
बन शिशु सा सार
जब चली हवा
ले शुद्ध बयार
अदभुद जीवन का संचार
मत अब इसको मिटने देना
ये है खुशियो का गहना
देती हमको कितने उपहार
बिन इनके नही जीवन सार
ये प्रकृति धरोवर
जीवन की
हर कण कण की
 जीवन दाती
ईश्वर का उपहार है
एक सच्चा वरदान है
हमे बदले में फर्ज निभाना है
नवांकुर रोपण कर
जन जन को जगाना है।

स्वरचित
मीना तिवारी
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महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)
चित्र गूगल से साभार

Thursday, September 17, 2020

बाढ़

प्रथम स्थान

महाराष्ट्र कलम की सुगंध

16/9/2020/बुधवार

विषय# बाढ#

विधा-काव्यःः

जलधर इतना जल भर लाऐ,

ये जल प्रलय से शोर मचाऐं।

मुश्किल में प्रभु पडी जिंदगी,

तुम गंगाधर अब हमें बचाऐं।


यहाँ नदियां नाले झूम रहे हैं।

प्रत्येक शिखर ही चूम रहे हैं।

तांडव नृत्य करते जल देवा,

घुमड घुमडकर बरस रहे हैं।


मकान दुकान तैरते पानी में।

हाहाकार मचा रजधानी में।

घर गृहस्थी वहती रोजाना,

बहुत व्यथित हैं परेशानी में।


सैनिक सहायक बने हुए हैं।

सब सेवाकार्य में डटे हुए हैं।

डाल जान जोखिम में ऐसे,

वीर जवान सब लगे हुए हैं।


सब बाढ पीडित परेशान हैं।

क्या करें बहुत व्यवधान है।

जल प्रवाह भी रूकता नहीं,

पशुपक्षी अब डरे किसान हैं।

स्वरचितः ः

इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

मगराना गुना म.प्र.

जय जय श्री राम राम जी

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द्वितीय स्थान

नमन 

महाराष्ट्र क़लम की सुगंध 

विषय .....बाढ़ 

16-09-20 बुधवार 

ये दृश्य मौत का मंजर है, 

आपदा प्राकृतिक आई है। 

बारिश का रूप है बाढ़ बना , 

ये वृक्ष पर है चढ़ आई है। 


ये वृक्ष ही रक्षक बन जाये, 

विश्वास आस्था मन में है। 

पर वृक्ष सतत जीवन कितना , 

उसके मस्तिष्क के अंदर है। 


कहते हैं ये दैविक आपदा है, 

पर ये तो मौत निमन्त्रण है । 

विकराल रूप जल का देखो, 

घर का विनाश भयंकर है। 


ये रौद्र रूप महा प्रकृति का है, 

तुमने भी मर्यादा तोड़ी थी। 

प्रिय धरा का तुमने नाश किया , 

बंजर सम बना के छोड़ी थी। 

संरचित सुधा चतुर्वेदी मधुर 

                      मुंबई

द्वितीय स्थान

दिनांक - १६/०९/२०२०

दिन - बुधवार

विषय - बाढ़

विधा - मुक्तक

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भारी बारिश ने किया पूछो ना क्या हाल।

सड़कें पानी से हुई भरकर नदिया ताल।

डूबे घर सब पानी में डूब गए सब खेत -

अस्त-व्यस्त हालत हुई जनजीवन बदहाल।


डूबा जल में आशियां दिखे कहीं ना छोर।

कोलाहल क्रंदन करे त्राहि-त्राहि हर ओर।

जलमग्न हर थल हुआ डूबे जंगल पेड़ -

पशु, पक्षी, जन त्रस्त हो ढूंढे अपना ठौर।


कुदरत ने ऐसा किया जल से बड़ा प्रहार।

नर, नारी और जानवर असहायों लाचार।

जगह सुरक्षित ढूंढते हो हो कर बेचैन -

करें दुहाई रामजी कर दो बेड़ा पार।


रिपुदमन झा 'पिनाकी'

धनबाद (झारखण्ड)

स्वरचित

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तृतीय स्थान

नमन महाराट्र कलम की सुगंध

16 सितंबर 2020 बुधवार

विषय-बाढ़

विधा-कविता

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प्रकृति की आती आपदाएं 

बरपा सकती हैं बड़ा कहर,

गांव पानी में बह जाते कई,

तबाह हो जाते हैं कई शहर।


घर में रखा सामान खराब,

कहां जाएं दर्द मारे जनाब,

खत्म हो जाते सभी ख्वाब,

नहीं मिले माथे की आब।


रात गुजारते ,भूखा रहकर ,

सिर छुपाने की जगह नहीं,

पेड़ों पर चढ़कर बैठ जाते,

विपत्ति घेरती है जहां कहीं।


घोर संकट होता प्रकोप बाढ़,

नहीं पता कब आ जाए बाढ़,

सावन में अकसर आ जाती,

कभी आ जाये माह आसाढ़।।

**********************

स्वरचित, नितांत मौलिक

*******************

*होशियार सिंह यादव

मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01

कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा

 व्हाट्सअप एवं फोन 09416348400


महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।


अनुराधा चौहान 'सुधी'

सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

Wednesday, September 16, 2020

अंतर्द्वंद

प्रथम स्थान
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध
नमन मंच 💐🙏
दिनांक -15/09/2020
विषय - अंतर्द्वंद
विधा-गद्य

  तारों का उत्सव अब विश्राम ले रहा था। सूरज की छुटपुट किरणें स्वर्ण मल्लिका के समान तमस को पराजित करने को प्रतिबद्ध थीं।
जो नहीं पराजित हो पा रहे थे वे थे स्वयं पंडित रामनाथ शास्त्री के मन के भाव। विगत एक सप्ताह से स्वयं का स्वयं से युद्ध जारी था।
शहर के धनाढ्य व प्रभावित लोगों में से एक जीवन दास द्वारा संचालित 'जीवन दास संगीत महाविद्यालय' के शिक्षक ही नहीं प्राण थे रामनाथ शास्त्री, जिन के संरक्षण में अनगिनत प्रतिभाऐं अपने लक्ष्य तक पहुंची थी।स्वयं को पालक नहीं, सेवक मानते थे वह संस्था का।
उनकी सौम्यता व सरलता के कारण ,जीवन दास की मलिन छवि के विपरीत, संगीत विद्यालय दूर क्षेत्र तक अपना प्रभाव छोड़ने में सफल था।
बढ़ती प्रसिद्धि के चलते जीवन दास पूर्णता रामनाथ शास्त्री पर अपने विद्यालय का दायित्व डाले निश्चिंत थे । पर आज रामनाथ शास्त्री अपने दायित्व व मनःस्थिति से तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे।
सप्ताह पूर्व जब करुणा की सजीव मूर्ति चित्रा अपने दस वर्षीय पुत्र सुकेतु को उनके सम्मुख संगीत शिक्षा की अनुनय लेकर आई। तब उन्हें भली भांति ज्ञात था कि यह वही चित्रा है जिसने वैधव्य के प्रारब्ध को पूर्णता नकार कर उस मनुवादी समाज को तिलांजलि दे दी थी ,जिसका प्रतिनिधित्व जीवनदास सरीखे लोग करते थे।
पति के ना रहने पर संपत्ति व स्वयं पर सामाजिक लोभ का उसने प्रतिकार किया था। जिसके फलस्वरूप जीवनदास सरीखे लोगों का समूह अपने विरुद्ध तैयार कर लिया था।
इसी के चलते अब सुकेतु की संगीत शिक्षा में जीवन दास की अनुमति बाधक थी।
जब चित्रा के हठ पर सुकेतु का मधुर गायन सुना तो वह भली-भांति समझ गए कि बालक के गले में साक्षात सरस्वती विरजती हैं। पर जीवन दास के प्रति पूर्णता निष्ठा रखने पर उन्होंने शिक्षा देने से मना कर दिया।
प्रतिदिन भोर में ही चित्रा को सुकेतु के साथ विद्यालय के आगे शिक्षा याचक के रूप में खड़े देखकर रामनाथ शास्त्री अंतर्द्वंद की स्थिति से गुजर रहे थे। मना करने के बाद भी चित्रा की याचना पूर्ववत ही थी।
एक दिन शाम को मंदिर से लौटते समय उत्सुकतावश उनके कदम चित्रा के घर की ओर मुड़ गए।
चित्रा के घर से निकलते सुकेतु के मधुर स्वर, संध्या बेला को अनुप्राणित कर रहे थे। उस समय उन्हें स्वर्गीय आनंद की प्राप्ति हुई। आनंद ने अंतर्द्वंद पर विजय पा ली थी।
अगली भोर तमनाशक थी। विद्यालय के सामने खड़ी चित्रा व सुकेतु को देख अब रामनाथ शास्त्री ने आगे बढ़कर सुकेतु का हाथ थाम लिया।
सुकेतु को अंदर विद्यालय में ले जाते हुए रामनाथ शास्त्री को पिछली संध्या में जीवन दास को लिखे पत्र का स्मरण हो आया, जिसमें उन्होंने लिखा था," मैं आपका सेवक व मां सरस्वती का उपासक हूं। मां ने मुझे सुकेतु के रूप में अपनी उपासना का आदेश दिया है। और मैं इस उपासना के साथ ही विद्यालय की और आपकी सेवा कर पाऊंगा।"
सुकेतु के साथ अंदर विद्यालय में जाते हुए पीछे मुड़कर देखा, चित्रा का शुष्क मुख प्रसन्नता की आद्रता से नम था।

✍️डा.शुभ्रा वार्ष्णेय
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द्वितीय स्थान
नमन मंच महाराष्ट्र कलम की सुंगध
विषय_ अन्तर्द्वन्द
विधा-कविता
दिनांक १५-९-२०२०

इस किनारे ,उस किनारे,
 पर लगेगी नाव,
मन का प्रश्न स्वयं से,
 एक अनुबन्ध हैं|
और प्रकृति की देन,
 अन्तर्द्वन्द है|

आगा पीछा सोचना,
डरना, झिझकना,
आदमी के आचरण,
का अंग है|
मनुज की इच्छा शक्ति ही,
अन्तर्द्वन्द है|

जोड़ लें या तोड़ दे,
मुख मोड़ ले,
अब क्या करे ,
क्या ना करें|
इसी को तो कहते ,
अन्तर्द्वन्द हैं|

जिन्दगी के फैसले,
करते हुए जब,
मन की चंचलता ,
आकुल होती है|
उसे दिग्भ्रमित,
करता अन्तर्द्वन्द् हैं|

स्वार्थी, लोभी, कृपण,
कलुषित हृदय धारी ,
अपने को सदा,
मुखौटे मे छिपाते|
और मचाते भीतर,
ही भीतर द्वन्द हैं|

वीर ,शौर्य वाले निकलते,
जब मुहिम पर,
आत्म बल से लेते हैं,
निर्णय सदा|
खेल जाते जान पर,
करते न अन्तर्द्वन्द हैं|

आदमी है चाहता ,
शांति से हल सदा|
इसलिए चतुर्दिक ,
देखता है सोचता|
और तब सही हल,
करते अन्तर्द्वन्द हैं|

माँ सदा बेटे के हित में ,
सोचती है हृदय से|
प्यार की पराकाष्ठा,
संतानों के प्यार से|
व्यर्थ उसके लिए ,
सारे हीअन्तर्द्वन्द हैं|

द्वन्द्व जब निष्पक्ष होगा,
किसी मसले में|
सत्य का अनुशरण,
करता द्वन्द्व जब मन मे|
सही निर्णय करते,
तब यही अन्तर्द्वन्द हैं|

वुद्धि और विवेक,
कर्मठता कुशलता |
किसी भी कारण के,
निमित्त हैं सोचते|
मनुज के जीवन का,
सारथी अन्तर्द्वन्द है|

स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित
 विजय श्रीवास्तव
 बस्ती
दिनांक १५-९-२०२०
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तृतीय स्थान
नमन मंच
महाराष्ट्र क़लम के सुगंध
विषय ...अंतर्द्वंद
15-09-20

 विधना ने विध के दिया ,
    जीवन संग अंतर्द्वंद ।
       कभी खुशी कभी गम दिया ,
. सब विधना के रंग ।

  कहीं धन अभाव है ,
     कहीं स्वास्थ का तनाव है ।
        कहीं महामारी तो कहीं ,
           क्रूर शत्रु का दबाव है ।

औलादों की प्रतिक्रिया ,
    अवसाद बनके आई है ।
        संवादहीन बनोगे तो ,
           अंतर्द्वंद मन में छाई है ।

वाद करो विवाद करो ,
    और करो मधुर संवाद ।
       सबसे सुन्दर मार्ग ये ,
           ना झांकें कोई तनाव ।

तनाव के चक्रव्यूह को ,
   कभी रचने न देना ।
       बनना तुम अभिमन्यु ,
           भेदन झट कर देना ।

अंतर्द्वंद की छाप को '
   मत मन में करो प्रवेश ।
     मन को पावन रूप दो ,
       द्वंद से कर मति भेद ।

स्वरचित सुधा चतुर्वेदी मधुर
                         मुंबई

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महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र गूगल से साभार

Monday, September 14, 2020

सराहनीय प्रस्तुति (हिन्दी दिवस)

सराहनीय प्रस्तुति
🥀🥀🥀🥀🥀🥀
नमनमंच संचालक ।
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध
आयोजन - हिन्दी दिवस।
शीर्षक - "हिंदी राष्ट्री धरोहर है"
स्वरचित।

गांधी,बोस,विनोवा भावे,
घूमे लेकर छोर से छोर।
राष्ट्रीय आंदोलन की अगुवा
बनी आजादी का स्वर है।
हिन्दी राष्ट्र धरोहर है।।
******
राष्ट्रीय एक्य के भाव जगाये।
प्रादेशिक भाषायें अपनाये।
वैज्ञानिक आधार अपनाये।
बोली बड़ी मनोहर है।
हिन्दी राष्ट्र धरोहर है।।

अतुल ज्ञान को लेकर चलती।
नव-नव अनुसन्धान है करती।
देश भक्ति का संधान है करती।
बोली जाती घर-घर है।
हिन्दी राष्ट्र धरोहर है।।

संस्कृत की है प्यारी बेटी
पालि प्राकृत की बहना।
अपभ्रंस बना बहाना जन्म का
पावन मानसरोवर है।
हिन्दी राष्ट्र धरोहर है।।

भारत माता का है सम्मान।
हम सबको है बड़ा अभिमान।
देशभक्ति की यही पहचान।
सब भाषाओं से बेहतर है।
हिन्दी राष्ट्र धरोहर है।।
****

प्रीति शर्मा"पूर्णिमा"
14/09/2020
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀
महाराष्ट्र कलम की सुगंध
14 सितंबर 2020
विषय-हिंदी दिवस
विधा-कविता
************************
हिंदी दिवस वेे मना रहे,
कर रहे अंग्रेजी में बात,
वो कैसे भारत वासी हैं,
नहीं देते, जो देश साथ।

खा रहे भारत देश का,
गा रहे अंग्रेजी के गुण,
निज बच्चों को कह रहे,
अंग्रेजी में बनना निपुण।

हिंदी भारत की आत्मा,
ऊपर है जगत परमात्मा,
जब तक प्यारा देश रहे,
हिंदी से रखे शुद्ध आत्मा।

प्रणाम हिंदी दिवस आज,
लो बनाये इसे माथे बिंदी,
गीत गाएं मिलकर आज,
पंजाबी हो या हो वे सिंधी।

मधुर, सरस, सलिल होती,
सुन हिंदी खुश मन आत्मा,
हिंदी हैं हमारी मां की भाषा,
हिंदी भाषा होती परमात्मा।।
************************
स्वरचित, नितांत मौलिक
*******************
*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
 व्हाट्सअप एवं फोन 09416348400
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀
नमन मंच
दिनांक14/9/20
विषय-हिंदी दिवस


हिंदी हमारी भाषा।
नाता है अच्छा खाशा।

है धर्म यहाँ अनेको।
है भिन्न भिन्न भाषा।

है कठिन बहुत हिंदी।
जिसको न आये ये भाषा।

ये संस्कृत की है बेटी।
ऋषि मुनियों ने तराशा।

रखती है जोड़कर हमे।
ये हिंदी की है सरलता।

सिखाती है विनम्रता।
भावो की अभिव्यक्तता।

अपनापन हमे सिखाती।
ये मातृ भूमि की भाषा।

आओ बढे संकल्प लेकर।
रखे विचार की समता।

हर रोज हिंदी दिवस हो।
ये न्याय की हो सत्ता।

भाषा भी अच्छी अंग्रेजी।
पर हिंदी से न विमुखता।

सम्मान हो सभी का।
अपमानित न हो कोई भाषा।

स्वरचित-
मीना तिवारी
पुणे महाराष्ट्र
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀
नमन मंच
दिनांक 14/9/2020

विषय-हिन्दी दिवस
विधा-छन्दमुक्त कविता


सिंध से हिन्द फिर हिन्दी बना
कई भाषा मिलकर हिंदी बना।

हिंदी हम सब की पहचान है
हम भारतीय  की  शान है।

हिंदी माता की दुलार है
हिंदी पिता का प्यार है।

हिंदी हमारी अभिव्यक्ति है
यही भाषा की शक्ति है।

हिंदी  सुमधुर संगीत है
मन को छूने वाली गीत है।

हिंदी नदियों की धार है
बारिश की ठंडी बौछार है।

सुबह की शीतल बयार है
हिंदी ही हमारा संसार है।

हिंदी बर्फ सी फैली चादर है
नदियों को एक करता सागर है।

हिंदी सावन की हरियाली है
सुबह निकलती किरन की लाली है।

नूरफातिमा खातून "नूरी"( शिक्षिका)
जिला-कुशीनगर

मेरी रचना मौलिक स्वरचित है

महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'

चित्र गूगल से साभार
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

पिता

  प्रथम स्थान नमन महाराष्ट्र क़लम की सुगंध मंच दिनांक - १६/१०/२०२० दिन - शुक्रवार विषय - पिता --------------------------------------------- ...