Monday, September 14, 2020

हिन्दी दिवस

प्रथम स्थान
आयोजन- हिंदी दिवस
विधा- गीत
आधार छंद- सरसी
मात्रा विधान-१६,११=२७ अंत गाल
" हिन्दी भाषा "

हिन्द-देश के वासी हैं हम,हिन्दी अपनी शान।
हिन्दी से ही मान हमारा,हिन्दी ही पहचान।

निज भाषा का करो सदा सब,
                      नित आदर सत्कार।
रहो सभी से मिलजुल करके,
                       छोड़ो सब तकरार।

गर्व हमें हिन्दी भाषा पर,हिन्दी अपनी जान।
हिन्दी से ही मान हमारा,हिन्दी ही पहचान।

भटक गए हैं कुछ साथी तो,
                     उन्हें दिखाओ राह।
ठेस न पहुँचे कभी किसी को,
                     रखिए ऐसी चाह।

हिन्दी भाषा का सब मिलकर,करिए नित सम्मान।
हिन्दी से ही मान हमारा, हिन्दी ही पहचान।

बातचीत करिए हिन्दी में,
                      खास रहे या आम।
हिन्दी भाषा में ही हो अब,
                     सब सरकारी काम।

दर्ज राष्ट्रभाषा के पद पर,करिए सब अभिमान।
हिन्दी से ही मान हमारा, हिन्दी ही पहचान।

हिन्दी है बिन्दी के जैसे,
                  सदा बढ़ाती साज।
मधुर-मधुर हैं शब्दावलियाँ,
                 भाषा का है ताज।

लेन-देन हो सब हिन्दी में,रखिए इसका ध्यान।
हिन्दी से ही मान हमारा,हिन्दी ही पहचान।

स्वरचित
रामप्रसाद मीना 'लिल्हारे'
चिखला बालाघाट (म.प्र.)

प्रथम स्थान
नमन मंच--महाराष्ट्र कलम की सुगंध
तिथि--14/09/2020
विषय-- आलेख हिन्दी दिवस

हिन्दी:कल, आज और कल
*********************

हिन्दी हमारी मातृभाषा और हमारी राष्ट्रभाषा है। हमारे राष्ट्र के माथे की बिन्दी है। भाषा संप्रेषण का सशक्त साधन होता है। जीवंतता, स्वायत्तता तथा लचीलापन भाषा के प्रमुख लक्षण हैं। इसलिये देश में हिन्दी बोली जाने के आधार पर 14 सितंबर 1949 को संविधान की भाषा समिति ने हिंदी को राजभाषा पद पर स्वीकृत किया और 1963 में राजभाषा अधिनियम जारी हुआ। यही कारण है कि हम 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रुप में मनाते हैं।
साहित्यकारों ने हिन्दी के लिये बहुत कुछ किया।हिन्दी को अपनी लेखनी और साहित्य से समृद्ध किया है। आधुनिक हिन्दी के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद ने कहा था अपनी भाषा की उन्नति में ही अपनी उन्नति है। आगे महावीर प्रसाद द्विवेदी,माखनलाल चतुर्वेदी,हज़ारी प्रसाद द्विवेदी,प्रेमचंद,निराला,पन्त,महादेवी वर्मा, बच्चन आदि ने हिन्दी को खूब समृद्ध किया है। आज भी हिन्दी में बहुत कुछ लिखा जा रहा है,,,पर हिन्दी भाषा के साथ एक बड़ी बिडंबना है। विश्व में ७० करोड़ लोग हिंदी भाषी हैं और यह तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। लेकिन हिंदी प्रचार प्रसार के लिए सरकार द्वारा जो समुचित कदम उठाये जाने चाहिये थे वो उन्होंने नहीं किया। भले ही विश्व के विश्व विद्यालयों में हिंदी अध्यापन हो रहा है परंतु विडंबना यह है कि हिंदी भाषा अपने ही घर में उपेक्षित ज़िन्दगी जी रही है। यहाँ गुड मॉर्निंग से सूर्योदय और गुडनाइट से सूर्यास्त होता है। हैप्पी बर्थ डे से जन्म और आर आई पी से मरण संदेश भेजे जाते हैं। सच पूछा जाये तो अंग्रेजी बोलने वाले को बुद्धिमान और हिंदी बोलने वालों को समाज में हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता है। जब भी हिंदी दिवस आता है हम हिंदी पखवाड़ा मना कर "हिंदी मेरी शान हिंदी मेरी जान "बोल कर अपने कर्तव्य को पूरा कर लेते है। माता-पिता भी कम दोषी नहीं, जब वे अपने बच्चों को बोलना सिखाते हैं तब अपने बच्चे के आगे अंग्रेज़ी परोसने लगते हैं। हिंदी की दशा हमारी दोहरी नीति की शिकार हो गई है।
हिंदी को कभी सर्वश्रेष्ठ भाषा का दर्जा प्राप्त था। आज उसकी ऐसी दुर्दशा जिसे लोग बोलने में ,संदेश भेजने में शर्म का अनुभव करते हैं। अंग्रेज़ी में संवाद लिख या बोल कर अपने को संभ्रांत महसूस करते हैं। हिंदी और अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा का प्रचलन (हिंगलिश) शहरों में तो आम बात है, अब तो गाँव में भी देखने, सुनने को मिलने लगा है।
हिंदी की दुर्दशा का आकलन तो इसी बात से लगाया जा सकता कि इंग्लिश मिडियम स्कूलों में हिंदी का आस्तित्व बचाने के लिए अनिवार्य विषय के रुप में पढ़ाने के लिए सरकार को प्रयास करने पड़ रहे हैं। विदेशी भाषा के ज़ंजीर से जकड़ी हिंदी को दोयम का दर्जा प्राप्त है। #अंग्रेज चले गये पर अपनी #अंग्रेजी छोड़ गये और भारतीयों पर इस कदर हावी है कि इसके आगे अपनी भाषा हिन्दी के प्रति रुझान नहीं,,,गर्व नहीं। मुझे तो आशंका है,,,जब स्वतन्त्रता के बाद भरत में अंग्रेजी ने इतनी जल्दी लोगों पर कब्जा जमा लिया है तब अगले 50 वर्षों में हिन्दी की स्थिति क्या होगी!!??
स्वरचित
अनिता निधि
जमशेदपुर, झारखंड
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द्वितीय स्थान
नमन मंच
#महाराष्ट्र क़लम के सुगंध
विषय ....हिन्दी दिवस
14-09-20 सोमवार

स्वाभिमान मेरी हिन्दी भाषा ,
  अभिमान मुझे हिन्दी माँ का ।
      आँचल   भाषायें   पुष्पमयी ,
        पर   हार सूत्र   हिन्दी भाषा ।

रस अलंकार से शोभित है ,
  माँ भारत भाल सजी हिन्दी ।
    कवि उद्यानों में महक रही,
       सुरभित साहित्य करे  हिन्दी ।

सूर - भक्ति सरोवर  में डूबी ,
   तुलसी मर्यादित ओढ़े चुनरी ।
      रसखान पगी मीठी भाषा,
        मीरा के  अधरन  की हिन्दी ।

भारत के भाल पर चन्दन है ,
    भारत माँ रूप में कंचन सी ।
        संस्कारी संस्कृति रूपवान ,
          मर्मस्पर्शी संबोधित हिन्दी ।

मस्तक पर बिन्दी सजती है ,
  पर रुदन क्यों करती है हिन्दी ।
    क्यों असहाय है हिन्दी आज बनी,
      क्यों मोहताज है नारे की हिन्दी ।

संरचित .....सुधा चतुर्वेदी मधुर
                     .मुंबई
द्वितीय स्थान
नमन मंच
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध
दिनाँक-१४/०९/२०२०
विषय-हिंदी दिवस
विधा-कविता
-----------
हिंदी दिवस निर्धारित किया,
देकर राजभाषा का मान,
लिपि हो जिसकी देवनागरी,
उसी का हो सम्मान।।

हो उद्देश्य सफल हमारा,
करें प्रतिवर्ष यही संकल्प,
अंग्रेजी जैसी सह भाषा भी,
न हो हिंदी का विकल्प।।

मूल भावार्थ समाहित जिसमें,
नही दोगलापन लिये,
जैसा बोले वैसा लिख रहे,
नही पश्चिमी ढंग लिये।।

जनमानस की भाषा हिंदी,
सरस मधुर मनभावन है,
फिर क्यों अंग्रेजी की लूट मची,
हिंदी तो नेह सरसावन है।।

हिंदी पखवाड़े को हम मनाएं,
रचकर सारे विधान,
जन जन को जाग्रत करते,
बढ़ा हिंदी का रुझान।।

सर्वश्रेष्ठ विकसित संस्कृति का ,
है इसमें गुणगान,
तभी पश्चिमी देशों से आते,
शिक्षार्थी लेने ज्ञान।।

हिंदी दिवस पर प्रण करें,
हिंदी हो इकलौता नाम,
युगल विकल्प कुछ नही,
एकल भाषा में हो काम।।
-----
सविता परमार
मध्यप्रदेश
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 तृतीय स्थान
नमन करता हूं सभी हिंदी साहित्य के प्रेमियों को

🙏🙏🙏🙏
   "हिंदी हमारी भाषा ही नहीं बल्कि हमारी पहचान है, हमारी विरासत है इस विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हमें सदैव तत्पर रहना चाहिए "
     अभिषेक मिश्रा
#हिंदी दिवस विशेष २०२०

हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है।
 और इसे राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए पहल की थी। गांधी जी ने हिंदी को जनमानस की भाषा भी बताया था।

इस पर साल 1949 में स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जिसे भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(1) में बताया गया है कि राष्ट्र की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। क्योंकि यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था। इसी वजह से इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में घोषित कर दिया गया।

लेकिन जब राजभाषा के रूप में हिंदी को चुना गया और तो गैर हिन्दी भाषी राज्य खासकर दक्षिण भारत के लोगों ने इसका विरोध किया फलस्वरुप अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा।

लेकिन आज के समय में हिंदी भाषा लोगों के बीच से कहीं-न-कहीं गायब होती जा रही है लोग अंग्रेजी बोलने में अपने आप को आधुनिक समझने की भूल करते है
जबकि हिंदी में लिखे गए साहित्य हमें जीने का रास्ता दिखाते है।
ये सत्य है इंग्लिश ने अपना प्रभुत्व जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है यदि हालात यही रहे तो वो दिन दूर नहीं जब हिंदी भाषा हमारे बीच से गायब हो जाएगी लेकिन आज। का सबसे बड़ा संचार का माध्यम हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जिसे जस का तस पढ़ा और बोला जाता है।
 हमें यदि हिंदी भाषा को संजोए रखना है तो इसके प्रचार-प्रसार को बढ़ाना होगा। ज्यादा से ज्यादा लोगों को हिंदी साहित्य कि जानकारी और
सरकारी कामकाज में हिंदी को प्राथमिकता देनी होगी।
आज के युवाओं द्वारा ये प्रयत्न हो रहा है कि हमारी हिन्दी भाषा ने विश्व पटल पर सोशल मीडिया से लेकर इंटरनेट के माध्यम से एक अमिट छाप छोड़ी है।
अंत में ये कहना कोई अनुचित नहीं होगा कि वास्तव में यदि हम अपना और अपने देश समाज का विकास, उत्थान चाहते है तो सबसे पहले ये स्वीकार करना अति आवश्यक होगा कि भाषा का विकास सबसे पहले जरूरी है।।

मौलिक लेख
अभिषेक मिश्रा
बहराइच
उत्तर प्रदेश

तृतीय स्थान
नमन मंच
दिनांक....१४/०९/२०


गीत...हिंदी की जय होने दो
**********************
कब तक रोकोगे हिंदी को, अब तो जी लेने दो,
ग्रंथों में संजो के रखा, जन-जन का हो लेने दो,

कहाँ  व्यास ने जाकर के प्रकाशन करवाया था,
कहां वाल्मीकि ने बोलो  रामायण छपवाया था,
बढ़ रहा प्रकाश हिंदी का, अब आंखें खोलो ना,
ग्रंथों में  संजो के रखा,जन -जन का हो लेने दो ,

सर्व व्यापक, सरलता, सहज सम्मान पाया है,
राष्ट्रभाषा से  एकता का राष्ट्र भाव गहराया है,
हिंदी का मान- सम्मान अब जय गान होने दो,
ग्रंथों में रखा संजो के,जन-जन का हो लेने दो,

निज भाषा,निज बोली पर मन गर्वित हर्षाया है,
कविता,कहानी,लेख,चर्चा अच्छा समय आया है,
हर हाथ लेखनी सजी रहे, प्रसार, प्रचार होने दो
ग्रंथों में संजो के रखा,जन - जन का हो लेने दो ,

संगणक युग आया बदल गई  परिभाषाएं है,
नित नव सृजन हो रहा , नई विचारधाराएं  है,
तोड़ी सीमाएँ  हिन्दी ने, जय जय जय होने दो,
ग्रंथों में संजो के रखा,जन जन का हो लेने दो ...

सामाजिक माध्यम ने आज लोकप्रियता बढ़ाई है,
हिन्दी क्रांती युग की नव झलकियाँ नजर आईं है,
साहित्य की गंगा से मिल ,पावन इसको होने दो,
ग्रंथों में संजो के रखा,जन - जन का हो लेने दो ,

मनीषा सहाय सुमन
स्वरचित

महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।
💐💐💐💐💐 अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)
चित्र गूगल से साभार

Sunday, September 13, 2020

चित्र लेखन

12-09-20 
प्रथम स्थान
नमन मंच 🙏
#महाराष्ट्र_क़लम_के_सुगंध
आधारित चित्र
         .#जीवन_चक्र
शनिवार

ये जीवन का चक्र है मानव ,
   ये दिन चार बसेरा है ।
      दुनियाँ नश्वर रूप है मानव !
          क्या तेरा क्या मेरा है ?
               जो भी आया उसको जाना ,
           जन्म -मृत्यु का नियम यही ।
          न सुत पत्नी ना कोई प्रेमी ,
         विधि विधना की नियति यही ।
 हर पल क्षण ये आयु जा रही ,
   इसका तुझको ज्ञान नहीं ।
     जैसा कर्म वही फल भोगे ,
        तू नहीं  रखता ध्यान कभी ।
               जान अरे जीवन निस्सार है ,
             स्वर सांसो की बीणा है ।
            पंच तत्व से निर्मित तन ये ,
          सत्संगी बन जीना है ।
ये दुनियां सुन्दर रंगमंच ,
  सब पात्र  निभाते अभिनय हैं ।
     कोई हास्य पात्र कोई रौद्र रूप ,
        वीभत्स रूप के चेहरे हैं ।
                 कंचन काया मत उलझाए ,
              तू विषयों की बेल में ।
            कोई मधुर साथ न जाये ,
         क्यों उलझा मिथ्या खेल में ?
सांसारिक माया विचित्र पहेली ,
   नाते रिश्तों का फेरा है।
      जीवन में मेले बहुत जुड़े ,
         पर उड़ता हंस अकेला है।

स्वरचित      सुधा चतुर्वेदी मधुर
                       मुंबई

द्वितीय स्थान
नमन मंच

अवसाद के घेरे में
दुविधाओं के भंवर में
बैठ कर सोचता
विचारो की वसीयते
पोटली को थाम कर
बढ़ रही व्यग्रता
अन्तहीत द्वंदता
राह का पता नही
भवर में झूमता
दिख रही शून्यता
रहस्यों में उलझ रहा
भ्रमित जीवन सार ले
कुचक्र काल गति में
घूमता घूमता
फस गया जाल में
दुविधा की जिंदगी से
हे प्रभू
उबार दे
मार्ग को प्रशस्त कर
थक गया मैं
लथपथ
थक कर
खामोशियो में
बहकर


स्वरचित
मीना तिवारी

तृतीय स्थान
नमन मंच महाराष्ट्र कलम की सुगंध
विषय-चित्र लेखन
विधा-कविता
दिनांक 12-9-2020

बाबुल के घर से आई आत्मा,
फिर वापस वहीं पे जाना है|
ये दुनिया ससुराल हमारी,
चार दिनों का ठिकाना है|
ये रहस्यमय सन्नाटे ,
बस उनको ही डराते हैं|
जो दुनिया की माया में,
 खोकर उसे भुलाते हैं|
 तू कबीर को पढ़ले प्यारे,
 तू मोक्ष को पा जायेगा|
वैतरणी तू पार करेगा,
 कोई तुझे रोक नहीं पायेगा|
दास कबीर ने ये कहा है|
इसे याद तू कर ले|
 इसको करने की विधि ठीक समझ ले----
तन थिर मन थिर वचन थिर|
सुरति निरति थिर होय|
कह कबीर ता कलप को|
कलप न पावै कोय|
और-----------------
तुलसी दास जी ने ,
श्री राम चरित मानस में कहा है|
उसे हृदय में रख ले|
कलियुग में बस नाम अधारा|
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा|
जीवन भर सत्कर्म कर|
जीवन भर दिल से जप राम|
इस सुरंग से डर नहीं,
तेरे मालिक राम|
दास कबीर को याद कर|
और भज राम का नाम
राम नाम रस भीनी रे चदरिया,
झीनी रे बीनी| -----------
दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी,
जस की तस्वीर धर दीनी चदरिया,
झीनी रे बीनी|
दास कबीर की तरह यदि,
तू करेगा सारे जीवन के काम|
दास कबीर की तरह ही,
यदि भजेगा  राम का नाम|
तो ये सुरंग निश्चित तू पार करेगा|
भव सागर सातों के सातों पार करेगा|
और मोक्ष पायेगा |
भव बाधा से मुक्ति पायेगा|

स्वरचित
 सर्वाधिकार सुरक्षित
 विजयश्रीवास्तव
बस्ती
दिनांक-12-9-2020

महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र गूगल से साभार

Saturday, September 12, 2020

चित्र लेखन


11/9/20
प्रथम स्थान
नमन
चित्र लेखन

जो कली अभी खिली नहीं ,
न  पराग न  मधु मास  है ।
बचपन की वो देहलीज पर ,
ना युवा न  अभी विकास है ।

       करके बालिका विवाह ,
       उसके साथ ये अन्याय है।
       दी हाथ में है गुड़िया उसे ,
          समझा उसे नादान है।

कब तक चलेगी  रीत ये ,
बालिका वधू विवाह की ।
इसमें सभी का पाप है ,
अन्याय है अतिकार है ।

          क्यों बोझ मानते उसे ,
           वो प्रीत की रस धार है ॥
           माँ का  कलेजा मान है ,
           पिता को वरद हाथ है ।

उसकी उमर ना विवाह की ,
कच्ची कली , ना पुष्प है ।
उसको दिया भँवर जाल में ,
तो किसका ये अपराध है ।

स्वरचित    सुधा चतुर्वेदी   मुंबई

प्रथम स्थान

११/९२०२०
शुक्रवार
नमन मंच
महाराष्ट्र कलम की सुगंध
विषय- चित्रलेखन
विधा-कविता
-        -        -        -        -
           * बाल विवाह *
 अरे! नाचती है रक्त में,क्रोधित
    उदधि की लोल लहरें।
 कांपती है व्याकुल नजरें,मासूम
    खेलतीअभी घरआँगन में।
 नहीं देख सकती नजरें बच्ची
          को विदा होते।
   उठी भयंकर कलुष पीढ़ा
       अन्तर्मन में शूल से।
 छोटी सी बाला का अभी क्यों
         क्यों , ब्याह किया।
  हुआ ये जघंन्यअपराध ,ऐसा
          बोलो क्यों किया।
 अभी तोखुद ही गुड़िया मासूम,
        गुड़िया संग खेलती।
 लड़की अभी सयानी नहीं,जन्म
     लेते ही पराई जानी गई।
 और इतनी ही जल्दी विदा की
         घड़ी भी आ गई।
   बच्ची है गाय नहीं,जो पराये
      खूटे में बांध दी गई।
  अरे बांध दिया निर्दयता से क्या
        तुम्हें बोध नहीं। 
  ये ब्याह नहीं अपराध किया,
      अन्याय है,धर्म नहीं।
 नादान है जिसे जिम्मेदारी की
     अभी भनक भी नहीं।
 जीते जी मार दिया,सजा दिया
      इसकी, अभी सेअर्थी।
               * * *
*"नीलम पटेल" *प्रयागराज *

(स्वरचित,मौलिक, अप्रकाशित रचना)


द्वितीय स्थान
नमन मंच
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध
दिनाँक-११/०९/२०२०
विषय-चित्राधारित
विधा-मुक्तक
---------

अभी अभी तो आँगन में आयी
नही पायी अभी तो तरूणायी
फिर क्यों मुझे पराया करते
अभी तो फैलानी है रोशनायी।

माटी से बने खिलाने मेरे
रखे आँगन के कोने में तेरे
नही फेकना बाबुल उनको
वो ही रहेंगे मेरे चितेरे।

दादी माँ की सीखें है न्यारी
क्यों? बनाई ये चुनर प्यारी
गुड्डे संग क्यों घर है बदला
नहीं रही अब तुमको प्यारी।

आँगन में झूला है मेरा
सखियों संग डाला है घेरा
कौन है जो पेंग लगाये
मेरा नही वहाँ अब है डेरा।

कब तक रहूंगी मैं पराई
क्यों बन्द है मेरी पढ़ाई
इतना कर श्रृंगार मुझे
क्यों ये चूड़ियां पहनाई।

समाज के बंधन में बंधकर
किया बाल विवाह सीखों को सुनकर
बेटी सदा रही है पराया धन
दी बिदाई हृदय पर पाथर रखकर।
-----/-----
सविता परमार
मध्यप्रदेश

तृतीय स्थान
नमन मंच महाराष्ट्र की सुगंध
विषय- चित्र लेखन
विधा-कविता
दिनांक 11-9-2020

अपराध कियाऔर उसको,
 संस्कार कह दिया|
जालिम रुढियों ने,
जाने कितने ही सितम किया|
वो बाप का दिल माँ का दिल भी,
 कितना क्रूर था|
जोअपनी बेटी को ,
रिवाजों की भेंट कर दिया|
बेटी से बढ़कर रिवाजों,
की फिक्र रहती थी|
रिवाजों के डर से ,
ये संस्कार कर दिया|
बाल विवाह जैसा पाप ,
करते वो भगवान को भी न डरे|
ईश्वर न करेगा मांफ,
सोचना ही छोड़ दिया|
गुड़िया को सजा करके,
 समाज ने|
उसे भी बेजबान खिलौना,
 बना दिया|
कैसे कैसे सितम देखिए,
समाज ने किये|
और उसे संस्कार,
नाम दे दिया|
स्वरचित
 सर्वाधिकार सुरक्षित
 विजय श्रीवास्तव
बस्ती
दिनांक11-9-2020

महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र गूगल से साभार

Friday, September 11, 2020

ज़िंदगी के रंग

प्रथम स्थान
विषय; जिंदगी के रंग
************
जिंदगी के रंग अनोखे हैं जीवन में
कभी धूप कभी छांव है उपवन में

कभी हर्ष की प्रखर रश्मियाँ
कभी विषाद का तिमिर घना
कभी सावन की मधु फुहारें
कभी पतझर-अभिव्यंजना

कभी स्निग्धता,कभी गर्त दर्पण में
जिंदगी के रंग,अनोखे हैं जीवन में

कभी मधुरिम पुष्प-सुरभि
कभी चरायंध  है प्रतिपल
कभी सफलता कभी हार
प्रयास होते सफल-विफल

कभी स्मिति कभी  उर- कृन्दन में
जिंदगी के रंग अनोखे हैं जीवन में

कभी ऊंचाइयां आस्माँ की
कभी  जलधि सम गहराई
कभी रात्रि का तिमिर घना
कभी है प्रात की तरुणाई

कभी हर्ष कभी अवसाद है मन में
जिंदगी के रंग अनोखे हैं जीवन में

कभी है प्रवेग सरिता सा
कभी ठहराव हर गति में
कभी लाभ है कभी हानि
कभी बाधा  है  प्रगति में

कभी शूल हैं कभी फूल हैं  वन में
जिंदगी के रंग अनोखे हैं जीवन में

कभी सूर्य का ताप प्रखर
कभी तरुवर शीतल छाया
कभी विपन्नता तम उकीर्ण
कभी रहे  असीमित माया

जीवन चलता संकुचन -संवर्धन में
जिंदगी के रंग अनोखे हैं जीवन में

स्व रचित एवं मौलिक

एस पी दीक्षित
उन्नाव, उत्तर प्रदेश

द्वितीय स्थान
नमन मंच
महाराष्ट्र क़लम की सुगंध
विषय .....जीवन के कई रंग
10-09-20 गुरुवार

जीवन शैली इतनी सरल सहज नहीं होती,
जन्म से मृत्यु भिन्न रंग चित्र होती है।
कहीं रंग समता कहीं विषमता का फैला रंग ,
कहीं विश्लेषण कहीं समीक्षा रची होती है।

जीवन के संघर्ष रंग से मन संकुचित मत करना,
संघर्षों के बाद ही जोशीली आंधी उड़ती है ।
देखते हो सागर की खामोशी का हौंसला रंग,
खामोशी कितने तेज ज्वार भाटे ले आती है।

बया का श्रम रंग देखो तिनके बीन लाती है,
तिनके- तिनके से अस्थिर घोंसला बनाती है।
मुंह में दाना भरके बच्चों की परवरिश करती ,
पंखों से कुछ नहीं होता उड़ान रंग दिखाती है ।

ज्ञान के रंग से कालिदास ने महान ग्रंथ लिखे,
इसके बिन तुलसी तुलसीदास न बन पाते थे ।
भक्ति रंग बिन तो वाल्मीकि ना महान होते ,
त्याग रंग बिना राम जी वनवास न जा पाते थे ।

कोई भी राह हो कोई दास्ताँ कैसी हो कभी ,
हमको जिन्दगी रंगो से मार्ग चयन करना होगा ।
प्रतिभा कभी मोहताज नहीं होती किसी हाल में ,
शून्य से हजार तक हमको ही गिनना होगा ।

जिन्दगी इन रंग बिना सार्थक न हो पाती ,
मेहनत संघर्ष त्याग भक्ति ज्ञान रंग ऐसे हैं ।
रंग हैं उम्मीदों के धैर्य विश्वास -आस्था के ,
जिनके बिना जिन्दगी के भाग सब अधूरे हैं ।

स्वरचित सुधा चतुर्वेदी ' मधुर '
    भायन्दर (E) मुंबई

तृतीय स्थान
ये सँसार ......

ये संसार यह जिंदगी के रंग साहित्य संगीत सुर संगत सत्संग और सृष्टी के भिन्न भिन्न सतरंगी शरबती रंग से ही रंगीन है वर्ना यूं देखा जाय तो इस फानी दूनिया में रखा ही क्या है?
वे ही भाग्यवान है जिनके ये संग है!!!
इसलिऐ संगीत व साहित्य को लौकीक जीवन के साथ अलौकिक ऐसे आध्यात्मिक व धार्मिक प्रसंगो व प्रक्रियाओं के साथ भी जोडा गया है ताकी इँसान का जिंदगी के साथ साथ धर्म आध्यात्म में भी जी लगा रहे रस बना रहे
वर्ना जीने का अंतिम शाश्वत सहारा धर्म व धार्मिक क्रियाऐं भी शुष्क लगने लगती है!!

इसलिऐ हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई और तो और वैराग्यमय जैन धर्म में भी संगीत साहित्य और नृत्य द्वारा भग्ती साधना भावना व धर्म प्रभावना होते देखी जा सकती है ।

भारत में लौकिक व्यवहार जैसे शादी सगाई गोद भराई जन्म मूंडन नामकरण यग्योपवीत सँस्कारआदि अवसरों या होली धूलेटी गणगौर व अन्य तीज त्यौहारों में भी गीत संगीत व नृत्य काव्य द्वारा लोकरंजन होता है और उसका शारिरीक स्वस्थता व मानसिक मनोदशा को लेकर महत्व भी होता है!!

और तो और ग्रामिण अंचलो में किसी के अवसान पर रूदन करते हूऐ महिलाओं द्वारा जो वियोग विलाप किये जाते है उन शब्दों को कभी ध्यान से सुने तो उसमें भी आलाप और भरपुर काव्यमय गीत साहित्यसभर शब्द व उनके अर्थ छुपे हुऐ रहते है !!
और उसकी भी ऐक करूण अनुभुती होती है और गीतमय अभिव्यक्ती द्वारा दर्द और गम अवसाद विषाद का निवारण होता है !!!

संगीत व साहित्य अपने आप में एक अनुपम साधना है साधन है जीवन का अभिन्न अंग है वे भाग्यवान है जिनके ये सँग है !
वर्ना तो हम सब को मालूम ही है कि ये दुनिया कितनी बदरंग है !

इस दुनिया में जीना हो तो अन्तरमन में सरलता और स्वभाव में तरलता बनाये सामने वाले के अनुसार ढलने का प्रयास करें और प्यार से अपने पँसद के लोगों से गुफ्तगू करें मिलते रहे हो सके तो राहो में फूल बिछाऐं काँटो से परहेज रखें और प्यार महोब्बत बाँटते रहे! अपने और औरों के गम भी मिटाते रहे!!
एक अच्छा प्रसिद्ध गीत था *"ज्योत से ज्योत जलाते चलो प्रेम की गंगा बनाते चलो*"
जो आपको न भाये उनसे दु:श्मनी नहीं रखें बल्की असहज महसूस करो तो थोडी दूरी बनाऐं रखें!!

शेष तो यह संसार की मायाजाल है जिसमें
कई समस्याओं का सामना करना पडता है!!मसलन:

काम क्रोध मोह मान माया लोभ राग द्वेष क्लेश
आदि कषाय व नाना प्रकार के रोग -शोक आदि से भरी पडी है ये इँसानी जिन्दगीयाँ !!

देखे तो दिल दहल ऊठे दारूण दीनता व अभाव ग्रस्त गृहस्थियाँ!!

आदमी के ही आगे आदमी की पसरती हूई खाली हथेलियाँ!!

नत मस्तक हो के खडा है कहीं इँसान के आगे इँसान फैलाके अपनी झोलीयाँ!

कहीं चल रहे भिषण युद्द और कहीं चल रही है गोलीयाँ !

धर्म क्षैत्र देख कर भी कोई द्वन्द्व में पड जाये वहाँ भावनाऐं नही चलती
चलती है तो केवल बोलियाँ!!!

कहीं बहन दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में है तो भाई करता है अठखेलियाँ!

माँ बाप करते है मेहनत जोड़त पाई पाई और बेटा मनाता रंगरेलियाँ !

जन्मते ही चुप करा दी जाती है कई मासूम बेटीयों को और न सुन पाती है लोरियाँ !!

बहुत बार सोचने पर मजबूर करती है मुझे जीवन की सारी ये अनेक अनुत्तर पहेलियाँ !!


by Ashok doshi 7331109258

महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

Wednesday, September 9, 2020

पाती/पत्र


प्रथम स्थान
चित्रलेखन प्रतियोगिता
विषय: "पाती"
रचना: स्वरचित

सफ़ेद बाल, झुर्रियों से भरे हाथ,
धुंधलाई आँखे, मुँह में ना दाँत,
कुछ ऐसे अपने यौवन का
बखान लिख रही हूँ,
बरसों बाद तुम्हारी तरफ़ से
एक 'पाती' अपने नाम लिख रही हूँ।।

लिख रही हूँ वो जो तुम कहते कि
मैं किसी फिल्मी नायिका से कम नहीं,
और नज़र लगे मुझे ज़माने की
इतना इस ज़माने में दम नहीं,
फिर क्यों आज दर्पण में
अबला सी दिख रही हूँ,
एक 'पाती'...

बरसों बीत गए तुम बिन जीते हुए
जी रही हूँ किसी तरह ख़ुद को समेटे हुए,
ना कोई खाना पूछता है, ना ही पानी
क्यों होती है लाचार बूढों की ज़िंदगानी,
सच तो ये है कि रोज मैं
मर मर के जी रही हूँ,
एक 'पाती'......


- डॉ. निशीथ चन्द्र

द्वितीय स्थान

एक सकारात्मक पत्र
स्वयं के पुत्र को
संवेदनशील माँ का
वृद्दाश्रम से.......!!
----------------------
यूँ तो मैं ले लेती हूँ अकेले ही यहाँ सांस
पर क्या सकून मिलता काश! मुझे
कि कोई अपना होता पास!

वैसे मैं खा पी ले रही हूँ आराम से
तुम फिक्र मत करना
कोई दिक्कत नहीं है यहाँ खास!

मुझे तो आदत है बचपन से अभाव
में जीने की इस लिए आ जायेगा
मुझे धीरे धीरे रास!

पर मुझे तो एक खौंफ खाये जा रहा है
इस बात का
ईश्वर न करे कभी यदि मजबुर हुए तो तुम
तो कैसे कर पाओगे यहाँ निवास !

अधूरे मे एक ओर डर सताये जा रहा है
मुझे रात भर
बैचेन रहती हूँ आठों प्रहर
और हो जाती हूँ कभी कभी मैं उदास !
ये सोच सोच के कि
जब तुम लोक लाज से बहाओंगे आँसू
जब आश्रम के प्रांगण मे
पडी होगी मेरी लाश!

लोग क्या कहेंगे मेरे बेटे को?
कहीं कोई ताना तो
न मार देगा मेरे पोते को?
कोई भला बुरा तो न कह देगा मेरे
परिवार को?!
ऐसा सोच सोच के मैं हो जाती हूँ
हताश!

खाया पिया तन को लगता ही नहीं
इन्हीं बातों की फिक्र है मुझे
और हो जाती बहूत बार मैं निराश!

सब बातों को भूलने का मैंने बहुत
किया प्रयास
पर तुझे तो मालूम ही है
तेरी माँ का साफ्ट वेयर
है ही कुछ ऐसा खास!!
तुम अटके रहोगे मेर मन मस्तिष्क में
जब तक सांसों में उच्छ्वास !!

            By Ashok doshi
            Secunderabad
                7331109258
तृतीय स्थान
नमन मंच
दिनांक-9/9/20
विषय-पत्र
................
होकर व्यथिति
आहत मन से
ले कलम
उकेरती कागज पर
मन के उदगारों का प्रवाह
जो बह रहा था जाने कब से
नही कोई अपना रहा खाश
जिससे कर ले मन की बात
साथी भी कब का छोड़ गया
अरमानो को धो गया
समझा था जिसको लाठी
वो गया कमाने है थाती
चाहत इतनी बढ़ गई
उजली दुनिया खो गया
शायद उसको कुछ याद नही
है नदी पार मेरा गाँव
जहां रहती मेरी छाव
था खून पिला कर बड़ा किया
सपनो का एक नाम दिया
जो तरस रही एक आभा को
बुझती सांसो के तारों संग
लिख रही पत्र
एक आशा से
बेनाम पते के नाम से
ओ जा मेरे लाल प्रिये
बहते अश्को को नाम मिले

स्वरचित
मीना तिवारी

तृतीय स्थान
नमन मंच
महाराष्ट्र कलम की सुगन्ध
विषय-चित्रलेखन
शीर्षक-पाती
विधा-मुक्तक
--//------

सहेजती यादों को तेरी
पाती लिखती कलम मेरी
नही आता है तू लेकिन
स्पर्श को लिखती कलम मेरी।

आश्रम मेरा बना आशियाँ
घर आँगन ओर ये गलियां
अब यही ठिकाना है मेरा
नदारद यहां से मेरी कलियाँ ।

खत तेरा क्यों नही मिलता
प्रतिउत्तर को मन मचलता
राह ताकती दिन और रात
फिर भी डाकिया नही दिखता।

जब तुझे मेरी यह पूंजी मिले
अनकहे भावों की अनुभूति मिले
तब भावों में न हो जाना गुम
हर शब्द से खिल रहे हैं गुल।

नित नित तेरी राह निहारूँ
इंतजार तेरा पाती पर उतारूँ
बेबस मन को ढांढस बंधाकर
शब्दो को अश्रु स्नान कराऊँ।

पानी से भीगे इन भावो को
समझ लेना मन के घावों को
होगी बहुत देर तब तक बेटा
मिलेगी पाती जब तक बेटा।
-------
सविता परमार
मध्यप्रदेश

महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र लेखन से साभार

Tuesday, September 8, 2020

ममता/माँ

8/9/2020
प्रथम स्थान
-------
गर्भ में उभरते अंकुर को सहेजती
अपने मन के भावो को उकेरती
पीड़ा के चरम तक पहुंचकर वह
स्वर्णिम अनुभूति को जन्म देती।

नन्ही सी जान को वक्ष में समेटती
वात्सल्य की छटा को बिखेरती
भविष्य को अंक में सहेजकर
देख उसमें अपने सपने संजोती।

अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर
अतुलनीय ममत्व को लूटाकर
सर्वस्व सदा समर्पण करती
चलती सदा परछाई बनकर।

संस्कारो की जननी बनकर
जीवन का कौशल सिखाकर
भवसागर में तैरना सिखलाती
मुग्धित होती देखकर मुझे इठलाती।

देख मुझे अंतर्मन से पढ़ लेती
दूर रहकर अनहोनी की आहट देती
हर क्षण में तू समाहित है मां
मेरी हर साँस की ख्वाइश है मां।
-------------
सविता परमार
मध्यप्रदेश

द्वितीय स्थान
...........
ओ माँ
वो तेरे शगुन
की थाली।
वो रिवाजो की
कहानी
तू बहुत याद
आती है।
तू क्या गई।
सब साथ
ले गई।
परीक्षा हो
या नौकरी की
तलाश।
वो तेरा
दही चटाना।
तिलक लगाना
मन्नत के
धागे बाँधना।
मंदिरों के
चक्कर लगाना।
नजर उतारना
कभी कभी
मैं झूठी
बहाने बनाता
सिर दर्द का
अच्छा लगता
तेरा वो
टोटकों का
सिलसिला
बुदबुदाना किसकी
नजर लगी मेरे
लाल को
मालिश करना
तेरी वो सारी
शुभता और ममता
आज भी
मेरे मानस
पटल पर
तेरी अनुपस्थिति
उपस्थित के रूप में
अंकित है।
पर माँ आज
सर दर्द
पर कोई
नजर उतारने
वाला कोई नही
कोई नही कहता
तू थक गया रे
आ थोड़ी देर
के लिए
तुझे सहला दू
काश माँ
तू होती मैं कहता
माँ कुछ देर
के लिए
मुझे अपनी
गोंद में सो जाने दे
थक गया हूं
मैं बहुत....

स्वरचित
मीना तिवारी

तृतीय स्थान
परिवार की नींव माँ ही होती है ,
   उसकी बुनियाद टिकी उस पर ।
      उसकी मेहनत से ही स्तंभ खड़े ,
         घर की आहट उस पर ही कायम ।

           तुम सबको शीतल लगती हो,
              बरगद की छाँव तुम ही तो हो।

 समस्याओं का समाधान करती ,
    माँ चुटकी में सब सुलझाती है ।
      सारे व्यवधानों का ध्यान रखे ,
         घर में सामंजस्य बैठाती है ।

        जगती सागर में नाव डिगी ,
           कश्ती की पतवार तुम ही तो हो।

परिवार का पालन माँ करती है ,
   अपने समीप सब चाहती है ।
      कभी वादे संवादे भी करती,
         अभिव्यक्ति मीठी कर जाती है ।

        सब अर्पण और समर्पण तुम ,
             परिवार के शब्द तुम ही तो हो ।

बच्चों के मन की तुम तरंग ,
  उल्लास उमंग जीवन की हो ।
     गतिशील भरा जीवन तुमसे ,
        सबका स्वाभिमान तुम ही तो हो।

           जीवन में जब रस पान किया ,
              वो अमृत धार तुम ही तो हो।

बच्चों के हृदय की रक्त धार ,
   ऊर्जा गतिवान हुई तुमसे ।
      सब बुद्धि की तुम संचालक ,
           चिन्तन और मनन मिले तुमसे ।

     कोई शब्द लिखे तो कहां तक माँ,
      सब तन मन आधार तुम ही तो हो।

स्वरचित अप्रकाशित मौलिक रचना
     सुधा चतुर्वेदी मधुर
               ..मुंबई

तृतीय स्थान
               मां
उतार लाई स्वर्ग मां तुम,कैसे भुलाएं उपकार तेरा,
जिंदगी देती निज तन से,जीवन समर्पण तुझे मेरा
मां जगत में प्यारी होती,उसकी हो निराली शान,
कोई भी पैदा होता जब,लिखा पढ़ा बनाए महान।

जान लुटा दे पल भर में,नहीं डरे किसी काल से,
हर हाल में प्रसन्न रहती,न झुके जग की चाल से,
ईश्वर से पहले नाम लेते,मां कहाए ममता की मूर्त
बेशक बाप दगा दे जाए,माता नहीं निकलती धूर्त।

बार बार नमन देवी को,एक बार दर्शन दे दो मां,
यही आखिरी विनती हैं,माता करना इंकार तू ना।
जहां रहे सुख से रहाना, कभी मिलने को आएंगे,
धरा सम उपकार तेरे मां,जीवन भर नहीं भूलाएंगे।

तीनों लोकों में नहीं कोई,कर सके मुकाबला आज,
हर बात को सुनकर तुम, मन में रखती बनाए राज,
ब्रह्मा, विष्णु और शिव, कहलाती है तेरे उपकारी,
तेरी छवि अनोखी जग में,हो ममता की मूर्त न्यारी।
***************************
नितांत मौलिक,स्वरचित
***************************
*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400


महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र लेखन

07/09/2020
प्रथम
निहारती झरोखे से ,
  सुन्दर शोभित है एक नारी ।
     नख सिख से श्रृंगार करे ,
       चमके अद्भूद  आभा वाली ।
          गहने पहने शोभित लगती ,
               राजघराने की नारी ।
                 लगता ऐसा परसों की कह ,
                  बरसों नहीं आये हितकारी ।

बाट निहारे मुस्काये मंद ,
  जैसे नभ से नव परि प्यारी ।
     नयनन में एक आस बसे ,
       स्वाति नक्षत्र चातक आदी ।
          प्रीतम के स्वागत  को आतुर ,
            जल बिन मीन भई व्याधी ।
              मिलन की आशा हृदय लगाये ,
                तपन धरा तरसे पानी ।

स्वरचित    सुधा चतुर्वेदी
                 मुंबई

द्वितीय
नाक में नथ कंठ हासली कमर कंदोरा
पाँव नूपुर झंकार
माथे पर मेमद ,कर रची मेहंदी
सिंदूरी वर्ण सूरज भाल कपाल!!!
चांदनी रात और उमडता यौवन
क्यों नहीं रहेगीे बेताबी बेसब्री शायद
वो पुछ रही सवाल?
चढ चढ जोवूं डाघले म्हारा कद
आवेगा भरतार!!!
........ 
छपर भी पुराना पड गया तीडकन
लाग्या बाँस
घरे पधारो पियू मारा थे पुरी कर
दो आस!!
सर्द हवा व चांदनी रात और उस पर
ये मधूमास
नवरात्री नजदीक है खेलेंगे हम रास !!!
......
अब घर आ जाओ बनासा किस बिध करां
खुल कर मनडे री बात!!!
इशारा जरा समझो मेरा
घर में नणदल सास और आदरणीय दादी सास
जब जागूं जब ऐकली
काली कजरारी रात अमास
नभ में चमके बिजली
मन मारो उदास
जीव झकोला खाय और
अटके मारी साँस
सूनो लागे डागलो सूनो लागे विलास
नेडी नेडी करो नौकरी थे ढोला रहो थे म्हारे पास
...............
रचनाकार
अशोक दोशी

तृतीय

नववधु की प्रतीक्षा

आई पिया मिलन की बेला,
किये गोरी ने सोलह श्रृंगार।
प्रतीक्षारत हैं कजरारे नैना
झांके खिड़की के द्वार।।

दम-दम दमके रूप दामिनी
कुन्तल केश नागिन लहरायें।
मेंहदी रचे हाथों में चुड़ियां
खन-खन कंगना संग खनखनायें।।

घूंघट में है चांद सा मुखड़ा
उठा सकुचाती राह निहारती।
कब आयेंगे बालम मोरे
प्रतीक्षित मन प्रश्न दुहराती।।
***

प्रीति शर्मा "पूर्णिमा"

महाराष्ट्र कलम की सुगंध द्वारा आयोजित चित्र आधारित कविता लेखन में उत्कृष्ठ सृजन के लिए आपको ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं। महाराष्ट्र कलम की सुगंध परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता है।

अनुराधा चौहान 'सुधी'
सचिव (महाराष्ट्र कलम की सुगंध)

चित्र गूगल से साभार

पिता

  प्रथम स्थान नमन महाराष्ट्र क़लम की सुगंध मंच दिनांक - १६/१०/२०२० दिन - शुक्रवार विषय - पिता --------------------------------------------- ...